Yuva Haryana: हरियाणा और पंजाब में धान की कटाई के बीच पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था मजबूत की जा रही है। अब खेतों में आग का पता लगाने के लिए सैटेलाइट के साथ ड्रोन की भी मदद ली जा रही है। इसका उद्देश्य उन घटनाओं की पहचान करना है, जो सैटेलाइट की नियमित निगरानी से छूट सकती हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने दोनों राज्यों में निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था तेज करने के निर्देश दिए हैं।
केंद्र सरकार के अनुसार, पंजाब के 18 और हरियाणा के 16 जिलों में 1 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक विशेष उड़न दस्तों की तैनाती की गई है। ये टीमें जिला प्रशासन, कृषि विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पराली संरक्षण बल के साथ मिलकर काम कर रही हैं। मैदानी स्तर पर स्थिति की समीक्षा कर दैनिक रिपोर्ट भी तैयार की जा रही है।
सैटेलाइट के साथ ड्रोन से होगी निगरानी
पराली जलाने की घटनाओं का पता लगाने के लिए अब तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों के साथ ड्रोन के जरिए खेतों की वास्तविक समय में निगरानी करने की योजना है। इससे आग लगने की जगह की पहचान, धुएं की मौजूदगी और प्रभावित खेतों का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
CAQM ने ड्रोन निगरानी के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) भी जारी की है। इसमें दोपहर बाद और शाम के समय, विशेषकर 3 बजे से रात 9 बजे के बीच निगरानी पर जोर दिया गया है। इसकी वजह यह है कि कुछ खेतों में आग लगने की घटनाएं सैटेलाइट के गुजरने के समय से अलग घंटों में हो सकती हैं।
हरियाणा में 50 ड्रोन तैनात करने की योजना
हरियाणा सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए जिला और ब्लॉक स्तर पर पराली संरक्षण बल बनाने तथा देर शाम गश्त बढ़ाने की योजना बनाई है। राज्य में कुल 50 ड्रोन तैनात करने की योजना है, जबकि शुरुआती चरण में 20 ड्रोन लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।
फतेहाबाद जिले में ड्रोन से निगरानी शुरू की गई है। पहले चरण में उन गांवों पर ध्यान दिया जा रहा है, जहां पिछले वर्षों में पराली जलाने की घटनाएं अधिक दर्ज हुई थीं। ड्रोन से आग का पता चलने पर संबंधित टीमें मौके पर जाकर निरीक्षण कर सकती हैं। इसके बाद GPS लोकेशन, खेत के रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
पंजाब में भी निगरानी और कार्रवाई तेज
पंजाब में भी पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए ड्रोन तैनाती, जिला स्तर की निगरानी और खेतों में उपलब्ध मशीनों के इस्तेमाल की समीक्षा की जा रही है। CAQM ने राज्य सरकार को फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों की उपलब्धता और उनके प्रभावी उपयोग पर ध्यान देने को कहा है।
इसके साथ ही धान की पराली के संग्रह, परिवहन और औद्योगिक इस्तेमाल की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया है। पराली से बायोमास पेलेट और ब्रिकेट तैयार करना तथा बिजली उत्पादन में इसका इस्तेमाल करना ऐसे विकल्प हैं, जिनसे खेतों में अवशेष जलाने की जरूरत कम हो सकती है।
पराली जलाने पर जुर्माना और कानूनी कार्रवाई
हरियाणा सरकार की योजना के अनुसार, पराली जलाने की पुष्टि होने पर संबंधित नियमों के तहत FIR, चालान और राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री जैसी कार्रवाई की जा सकती है। पर्यावरणीय मुआवजा भी वसूला जा सकता है। अधिकारियों का कहना है कि निगरानी का उद्देश्य केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी है।
राज्य में किसानों को मशीनों की उपलब्धता और पराली प्रबंधन के लिए सहायता देने पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे किसानों को अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार करने में मदद मिल सकती है।
दिल्ली-NCR की हवा पर भी पड़ेगा असर
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं सर्दियों में उत्तर भारत की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल है। हालांकि, दिल्ली-NCR के प्रदूषण के लिए वाहन, उद्योग, निर्माण कार्यों की धूल और अन्य स्रोत भी जिम्मेदार हैं।
ड्रोन से निगरानी, समय पर कार्रवाई और पराली के वैकल्पिक इस्तेमाल से खेतों में आग लगाने की घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तकनीक के साथ किसानों को पर्याप्त मशीनें, सहायता और फसल अवशेष के उपयोग के विकल्प कितनी प्रभावी तरह से उपलब्ध कराए जाते हैं।

