बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नजर रखेंगे हरियाणा के स्कूल, हर महीने बुलाए जाएंगे अभिभावक
Yuva Haryana: हरियाणा में स्कूली बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने एक नई पहल की तैयारी की है। अब स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) हरियाणा और स्कूल शिक्षा विभाग मिलकर ‘साथ’ (SAATH – Support & Awareness for Adolescents Through Parents) कार्यक्रम शुरू करने जा रहे हैं। इस कार्यक्रम के तहत स्कूलों में हर महीने अभिभावकों के लिए जागरूकता सत्र आयोजित किए जाएंगे।
हरियाणा की स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव ने बताया कि सरकार बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य माता-पिता को बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों और मानसिक तनाव के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने के लिए जागरूक करना है। इसके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के नोडल अधिकारी मिलकर पूरे साल का गतिविधि कैलेंडर तैयार करेंगे।
कक्षा 6 से 12वीं तक के बच्चों के अभिभावक होंगे शामिल
‘साथ’ कार्यक्रम के तहत 10 से 19 वर्ष की आयु के किशोरों के माता-पिता और अभिभावकों को जागरूक किया जाएगा। इसमें कक्षा 6 से 12वीं तक पढ़ने वाले विद्यार्थियों के परिवारों को शामिल किया जाएगा। स्कूलों में हर महीने होने वाले सत्रों में अभिभावकों को बताया जाएगा कि किशोरावस्था के दौरान बच्चों में मानसिक और भावनात्मक बदलाव किस तरह आते हैं और उन्हें किस प्रकार समझने की जरूरत है।
अभिभावकों को बच्चों से खुलकर बातचीत करने, उनकी समस्याएं ध्यान से सुनने और बिना डांट-फटकार के उनकी बात समझने के तरीके बताए जाएंगे। साथ ही यह भी समझाया जाएगा कि किन परिस्थितियों में बच्चे को काउंसलिंग या विशेषज्ञ की मदद दिलाना जरूरी हो सकता है।
परीक्षा का तनाव और बुलिंग जैसी समस्याओं पर रहेगा फोकस
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन हरियाणा के मिशन निदेशक डॉ. आरएस ढिल्लों के अनुसार किशोरावस्था में बच्चों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें परीक्षा का दबाव, दोस्तों के साथ मनमुटाव, स्कूल में बुलिंग यानी चिढ़ाना या डराना, डिजिटल गतिविधियों का प्रभाव और नशे की शुरुआती आदतों का खतरा शामिल है।
कई बार बच्चे अपनी परेशानियां स्कूल में बताने के बजाय घर पर अपने व्यवहार के माध्यम से जाहिर करते हैं। ऐसे में माता-पिता की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्यक्रम के दौरान अभिभावकों को बच्चों में चिड़चिड़ापन, अकेले रहने की आदत, उदासी, पढ़ाई में रुचि कम होना और व्यवहार में अचानक बदलाव जैसे संकेतों को गंभीरता से लेने की जानकारी दी जाएगी।
स्कूल काउंसलर से विशेषज्ञ तक मिलेगी मदद
इस योजना की खास बात यह है कि मानसिक परेशानी से जूझ रहे बच्चों को केवल जागरूकता तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि जरूरत के अनुसार उन्हें उचित सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी।
इसके लिए एक व्यवस्थित रेफरल व्यवस्था तैयार की जाएगी। सबसे पहले माता-पिता या शिक्षक बच्चे की परेशानी को पहचानेंगे। इसके बाद जरूरत पड़ने पर स्कूल काउंसलर की मदद ली जाएगी। आगे बच्चे को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), किशोर स्वास्थ्य सेवाओं और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) से जोड़ा जाएगा। गंभीर स्थिति में विशेषज्ञों की सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। प्रत्येक स्तर पर बच्चे की स्थिति का फॉलोअप किया जाएगा, ताकि उसे लगातार जरूरी सहयोग मिलता रहे।
स्कूलों में बनेगा सालभर का गतिविधि कैलेंडर
कार्यक्रम के तहत प्रत्येक भाग लेने वाले स्कूल में स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के नोडल अधिकारियों के सहयोग से वार्षिक गतिविधि कैलेंडर तैयार किया जाएगा। हर सत्र में स्कूल का नोडल अधिकारी, प्रशिक्षित फैसिलिटेटर और संबंधित किशोर अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिक (AFHC), जिसे मैत्री क्लीनिक भी कहा जाता है, सहयोग करेंगे।
अभिभावकों को स्कूलों के मौजूदा संचार माध्यमों से बैठक की जानकारी दी जाएगी। पहली सूचना बैठक से 7 से 10 दिन पहले भेजी जाएगी और कार्यक्रम के नजदीक आने पर दोबारा रिमाइंडर दिया जाएगा। बैठकों के निमंत्रण सामान्य विषयों पर आधारित होंगे, ताकि किसी अभिभावक को यह महसूस न हो कि केवल उसके बच्चे में कोई समस्या होने के कारण उसे बुलाया जा रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की पहल
सरकार का मानना है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी केवल स्कूल या अस्पताल की नहीं है। इसमें परिवार, शिक्षक और स्वास्थ्य विभाग सभी की भूमिका जरूरी है। इस पहल से अभिभावकों को बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को समझने और समय रहते सहायता लेने में मदद मिलेगी।
अभिभावक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता के लिए टेली-मानस हेल्पलाइन नंबर 14416 पर भी संपर्क कर सकते हैं। इस पहल का उद्देश्य बच्चों की समस्याओं को समय रहते पहचानना, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संकोच को कम करना और परिवार, स्कूल तथा स्वास्थ्य सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है।

