हिसार की गुरु जम्भेश्वर यूनिवर्सिटी में बिना PhD असिस्टेंट प्रोफेसर चयन पर विवाद, हाईकोर्ट ने नियुक्ति अंतिम फैसले के अधीन की
Yuva Haryana: हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUST) में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। पीएचडी की अनिवार्य योग्यता से जुड़े सवालों के बीच मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि भर्ती के विज्ञापन में पीएचडी अनिवार्य होने के बावजूद बिना इस डिग्री वाले अभ्यर्थी का चयन कर लिया गया। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद चयनित अभ्यर्थी की नियुक्ति को अंतिम फैसले के अधीन कर दिया है। अदालत ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों और चयनित उम्मीदवार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह मामला विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हुई नियुक्ति से जुड़ा है। याचिका डॉ. प्रदीप कोहली की ओर से दायर की गई है। मामले की सुनवाई जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की अदालत में हुई।
याचिकाकर्ता ने खुद को बताया योग्य उम्मीदवार
याचिकाकर्ता के अनुसार, वह पीएचडी धारक हैं और 14 अक्टूबर 2000 को यूजीसी की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) उत्तीर्ण कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि वह हरियाणा की पिछड़ा वर्ग-बी (BC-B) श्रेणी से संबंधित हैं। विश्वविद्यालय ने असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर भर्ती के लिए पहले विज्ञापन संख्या 3/2023 जारी किया था। पद खाली रहने के बाद इसी भर्ती के लिए विज्ञापन संख्या 19/2023 भी जारी किया गया। आवेदन जमा कराने की अंतिम तारीख 21 दिसंबर 2023 निर्धारित थी।
याचिकाकर्ता का कहना है कि भर्ती के विज्ञापन में पीएचडी की योग्यता अनिवार्य रखी गई थी। इसके बावजूद चयन प्रक्रिया में ऐसे उम्मीदवार को नियुक्ति के लिए चुन लिया गया, जिसके पास पीएचडी की डिग्री नहीं थी।
73 अंक पाने वाले उम्मीदवार का नहीं हुआ चयन
याचिका में दिए गए विवरण के अनुसार, पात्रता के मूल्यांकन में डॉ. प्रदीप कोहली को कुल 73 अंक मिले थे। इनमें पीएचडी के लिए निर्धारित 30 अंक भी शामिल थे। दूसरी ओर, जिस अभ्यर्थी का चयन किया गया, उसके पास पीएचडी नहीं थी और उसे मूल्यांकन में 35 अंक मिले थे।
याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि अधिक अंक और निर्धारित शैक्षणिक योग्यता होने के बावजूद उनकी नियुक्ति की सिफारिश नहीं की गई, जबकि कम अंक पाने वाले गैर-पीएचडी उम्मीदवार को चयनित कर लिया गया। आरोप है कि 22 जुलाई 2025 को हुए साक्षात्कार के बाद चयन समिति ने इस उम्मीदवार की नियुक्ति की सिफारिश की थी। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रतीक्षा सूची में एक अन्य गैर-पीएचडी उम्मीदवार को जगह दी गई।
UGC के 2018 नियमों का दिया हवाला
याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया को यूजीसी के 2018 के नियमों और भर्ती विज्ञापन की शर्तों के विपरीत बताया है। उनका तर्क है कि यूजीसी के संबंधित प्रावधानों के अनुसार 1 जुलाई 2023 से असिस्टेंट प्रोफेसर की सीधी भर्ती के लिए पीएचडी अनिवार्य थी। इसी आधार पर उन्होंने चयनित उम्मीदवार की नियुक्ति को चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता ने सूचना का अधिकार (RTI) कानून के माध्यम से चयन प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड भी प्राप्त किया था। इसके बाद विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद से मंजूरी मिलने पर 15 मई 2026 को चयन का परिणाम घोषित किया गया और उसी दिन नियुक्ति पत्र जारी किया गया।
हाईकोर्ट ने मांगा जवाब, अगली सुनवाई अप्रैल 2027 में
हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विश्वविद्यालय के संबंधित अधिकारियों और चयनित अभ्यर्थी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने उनसे याचिका में लगाए गए आरोपों पर जवाब मांगा है। विश्वविद्यालय को अगली सुनवाई से कम से कम सात दिन पहले अपना जवाब दाखिल करना होगा।
अदालत ने फिलहाल चयनित उम्मीदवार की नियुक्ति को इस मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रखा है। मामले की अगली सुनवाई 1 अप्रैल 2027 को निर्धारित की गई है।
अंतिम फैसले तक नियुक्ति पर बनी रहेगी कानूनी स्थिति
इस मामले में अभी हाईकोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है। अदालत ने फिलहाल नियुक्ति रद्द नहीं की है, बल्कि उसे याचिका के अंतिम नतीजे से जोड़ दिया है। अब विश्वविद्यालय को भर्ती विज्ञापन, पीएचडी की अनिवार्यता, चयन समिति के निर्णय और मूल्यांकन प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर अपना पक्ष रखना होगा।
हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि संबंधित पद पर हुई नियुक्ति निर्धारित भर्ती नियमों और विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप थी या नहीं।

