80 करोड़ के रेक्सिल घोटाले में भूपेंद्र हुड्डा को राहत, CBI की क्लोजर रिपोर्ट मंजूर
Yuva Haryana: हरियाणा के चर्चित रेक्सिल (Raxil) फफूंदनाशक घोटाला मामले में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और दो वरिष्ठ IAS अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है। पंचकूला की विशेष CBI अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की क्लोजर रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है। जांच एजेंसी को मामले में अधिकारियों और नेताओं के बीच साजिश, धोखाधड़ी या अनुचित लाभ पहुंचाने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इस फैसले के बाद लंबे समय से चल रहे इस मामले में हुड्डा और दोनों अधिकारियों के खिलाफ CBI की जांच समाप्त होने का रास्ता साफ हो गया है।
क्या था पूरा रेक्सिल घोटाला?
यह मामला हरियाणा में गेहूं के प्रमाणित बीजों को उपचारित करने के लिए रेक्सिल 2% DS फफूंदनाशक के इस्तेमाल से जुड़ा है। वर्ष 2010 में तत्कालीन भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार के दौरान एक नीति के तहत किसानों को पूरी सरकारी सब्सिडी का लाभ लेने के लिए प्रमाणित गेहूं के बीजों का रेक्सिल से उपचार कराना अनिवार्य किया गया था।
आरोप था कि इस फैसले से एक खास कंपनी और सप्लायर को फायदा पहुंचा। यह भी सवाल उठाया गया कि दूसरे विकल्पों के बजाय एक ही ब्रांड की खरीद को अनिवार्य क्यों किया गया। मामले में सरकारी खजाने को करीब 80 करोड़ रुपये का नुकसान होने का आरोप लगाया गया था। हालांकि, यह नुकसान जांच में साबित नहीं हुआ।
अशोक खेमका ने उठाए थे खरीद प्रक्रिया पर सवाल
इस मामले को वर्ष 2013 में तत्कालीन हरियाणा बीज विकास निगम के प्रबंध निदेशक और वरिष्ठ IAS अधिकारी अशोक खेमका ने प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने खरीद प्रक्रिया में कुछ शर्तों को शामिल किया था, जिनमें सप्लायर की दर देश में उपलब्ध सर्वोत्तम डीलर रेट के अनुरूप रखने और उत्पाद के पंजीकरण से जुड़ी शर्तें शामिल थीं।
बाद में खरीद प्रक्रिया में इन शर्तों को हटाए जाने पर सवाल उठे। इसके बाद मामला जांच के दायरे में आया। अगस्त 2015 में केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद CBI ने इस मामले में FIR दर्ज की और खरीद प्रक्रिया, वैज्ञानिक सिफारिशों तथा सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच शुरू की।
CBI जांच में क्या सामने आया?
CBI की जांच में पाया गया कि रेक्सिल के इस्तेमाल से जुड़ा निर्णय अलग-अलग प्रशासनिक स्तरों पर विचार-विमर्श के बाद लिया गया था। खरीद को हाई पावर परचेज कमेटी ने भी मंजूरी दी थी और अंतिम स्वीकृति तत्कालीन मुख्यमंत्री के स्तर पर दी गई थी।
जांच एजेंसी के अनुसार, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने 1999 से 2001 के बीच किए गए वैज्ञानिक मूल्यांकन में रेक्सिल को गेहूं की कुछ प्रमुख बीमारियों—लूज स्मट, फ्लैग स्मट और करनाल बंट—के उपचार के लिए प्रभावी पाया था। इसके अलावा, उत्पाद को केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति से भी पंजीकरण मिला हुआ था।
CBI ने दूसरी सरकारी संस्थाओं की खरीद दरों से तुलना भी की। जांच में कीमतों को असामान्य रूप से अधिक या बढ़ा-चढ़ाकर तय किए जाने का प्रमाण नहीं मिला। एजेंसी को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, सरकारी खजाने को गलत तरीके से नुकसान पहुंचाने या किसी अधिकारी को अनुचित आर्थिक लाभ देने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
Bayer कंपनी के विज्ञापनों पर अलग सवाल
हालांकि, जांच में Bayer Crop Science से जुड़ा एक अलग पहलू सामने आया। CBI के मुताबिक, कंपनी ने वर्ष 2012 में अखबारों में ऐसे प्रचार विज्ञापन प्रकाशित करवाए थे, जिनमें हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिशों का उल्लेख था। जांच एजेंसी ने पाया कि इन जानकारियों को केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति के सामने उचित तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया था।
इस पर विशेष CBI अदालत ने संबंधित नियामक संस्था को आवश्यक कार्रवाई के लिए विस्तृत नोट भेजने का निर्देश दिया। यानी सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने वाले सबूत नहीं मिले, लेकिन कंपनी के विज्ञापनों और जानकारी छिपाने से जुड़े पहलू पर नियामकीय कार्रवाई का रास्ता खुला रखा गया।
अदालत के फैसले से एक दशक पुराना मामला बंद
हरियाणा सरकार की ओर से भी क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने पर आपत्ति नहीं जताई गई। इसके बाद विशेष CBI जज विजयंत सहगल ने रिपोर्ट को मंजूरी दे दी और मामले के दस्तावेज रिकॉर्ड रूम में भेजने का आदेश दिया।
इस फैसले से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कार्यकाल में लिए गए रेक्सिल खरीद संबंधी फैसले पर चल रही CBI जांच का समापन हो गया है। करीब एक दशक से चर्चा में रहे इस मामले में अब अदालत के आदेश के बाद कानूनी प्रक्रिया का यह अध्याय बंद हो गया है।

