Yuva Haryana: हरियाणा के पंचकूला स्थित एक सरकारी स्कूल में मासूम बच्ची पर हुए हमले की घटना ने पूरे शिक्षा तंत्र को हिलाकर रख दिया है। इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए मानवाधिकार आयोग ने घटना की गहन स्टडी करने और सिस्टम में बड़े बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस शील नागू ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।
घटना की पृष्ठभूमि और लापरवाही
जांच में सामने आया है कि यह घटना केवल एक छात्र की करतूत नहीं, बल्कि स्कूल प्रबंधन की गंभीर लापरवाही का भी परिणाम थी। परीक्षा केंद्र के निरीक्षण के बाद यदि बंद किए जाने वाले कमरों की ठीक से जांच की जाती, तो यह हादसा टाला जा सकता था। घटना के समय स्कूल के कुल 20 कर्मचारियों में से 8 शिक्षक सेमिनार में गए थे, जिससे लगभग 700 बच्चों की निगरानी और सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। लापरवाही मिलने पर स्कूल की प्रिंसिपल नीलू कल्याल सहित अन्य जिम्मेदार लोगों को निलंबित कर दिया गया है।
मोबाइल गेम ‘फ्री फायर’ और बच्चों का व्यवहार
पुलिस और जांच टीमों की पूछताछ में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि आरोपी छात्र को मोबाइल गेम खेलने की लत थी। उसने वारदात से दो दिन पहले पड़ोस की एक महिला के मोबाइल हॉटस्पॉट के जरिए ‘फ्री फायर’ गेम दोबारा डाउनलोड किया था। हालांकि, इस हिंसक गेम और घटना के सीधे संबंध की अभी तकनीकी व मनोवैज्ञानिक जांच की जा रही है। चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित जीएमएसएच के मनोरोग विभाग के डॉक्टरों का पैनल आरोपी बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार की काउंसलिंग व जांच कर रहा है।
शिक्षा विभाग के नए और कड़े निर्देश
इस दुखद घटना के बाद शिक्षा विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है:
शिक्षकों को सख्त निर्देश: सभी स्कूलों के प्रिंसिपल और शिक्षकों को निर्देशित किया गया है कि वे बच्चों को कक्षा में कभी भी अकेला न छोड़ें। अवकाश के समय भी बच्चों के साथ शिक्षक मौजूद रहें ताकि उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जा सके।
विशेष मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली: सरकार से यह सिफारिश की गई है कि स्कूलों में बच्चों की मानसिकता को समझने और उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों का समय पर आकलन करने के लिए एक विशेष प्रणाली विकसित की जाए।
प्रशिक्षण कार्यक्रम: शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चों के व्यवहारगत बदलावों को समय रहते पहचानने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि चाइल्ड साइकोलॉजी के जरिए ऐसी समस्याओं को शुरुआती स्तर पर ही दूर किया जा सके।

