Yuva Haryana: हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के छोटे बेटे और पूर्व सांसद कुलदीप बिश्नोई पिछले तीन महीनों से पूरे राज्य में एक विशेष जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। हालांकि, पानीपत, कुरुक्षेत्र, जींद, कैथल और दादरी जैसे जिलों में आयोजित हो रहे इन ‘स्नेह मिलन’ कार्यक्रमों की सबसे खास बात यह है कि मंच या आयोजनों में कहीं भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के झंडे, बैनर या अन्य प्रतीक चिह्न नजर नहीं आ रहे हैं।
राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकित न किए जाने के बाद 21 जुलाई को सिरसा से शुरू किए गए इस अभियान ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है।
“संघर्ष ने मुझे झुकना नहीं, आगे बढ़ना सिखाया”
दादरी में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए बिश्नोई ने साफ किया कि वह किसी के आगे झुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा:
“संघर्ष ने मुझे झुकना नहीं सिखाया, बल्कि आगे बढ़ते रहना सिखाया है। आप सभी के विश्वास और समर्थन से मेरा साहस और संकल्प मजबूत है। दादरी ने इस यात्रा को नई ऊर्जा दी है और यह कारवां आगे बढ़ता रहेगा।”
उन्होंने राजनीति के अपने उतार-चढ़ाव भरे सफर को याद करते हुए कहा कि परिस्थितियां और रास्ते जरूर बदले, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों और जनता से रिश्ते से समझौता नहीं किया।
क्या भाजपा से दूरी बना रहे हैं बिश्नोई?
हालांकि बिश्नोई ने खुद यह स्पष्ट किया है कि वे भाजपा के साथ बने हुए हैं और पार्टी छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया है, लेकिन उनके करीबी सहयोगियों का कहना है कि यह पुराने संपर्कों और भजन लाल परिवार से जुड़े लोगों को एकजुट करने का प्रयास है।
वहीं, भाजपा नेतृत्व इस स्थिति को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
भाजपा मीडिया प्रमुख भूपेशवर दयाल का बयान: “कुलदीप बिश्नोई पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और सामाजिक गतिविधियों में लगे हैं। इसमें कोई पार्टी विरोधी बात नहीं है। हालांकि, उनके बेटे और पूर्व विधायक भव्य बिश्नोई भाजपा के कार्यक्रमों और पार्टी बैनर तले ही काम कर रहे हैं।”
सहानुभूति और तल्खी: कुछ महीने पहले भाजपा की राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा द्वारा पूर्व सीएम भजन लाल पर की गई टिप्पणी के बाद बिश्नोई और बिश्नोई समाज ने कड़ी नाराजगी जताई थी। बाद में सांसद ने खेद व्यक्त किया था। इस तल्खी को कम करने के लिए जून में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी आदमपुर में भजन लाल की जयंती कार्यक्रम में शामिल भी हुए थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिश्नोई का यह बिना झंडों वाला ‘स्नेह मिलन’ अभियान पार्टी पर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराने और अपने जनाधार को मजबूत रखने की एक रणनीति है।

