गुरुग्राम और नोएडा में अव्यवस्थित निर्माण पर हाईकोर्ट सख्त, स्टिल्ट प्लस फोर नहीं होने से चंडीगढ़ रहने योग्य
Yuva Haryana: हरियाणा में आवासीय भूखंडों पर स्टिल्ट प्लस फोर मंजिल निर्माण की नीति को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि निर्धारित नियमों से अधिक भवन निर्माण की अनुमति देना और महज शुल्क लेकर नियमों में छूट देना शहरी नियोजन के मूल उद्देश्यों को कमजोर कर रहा है। कोर्ट ने गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहरों की अव्यवस्थित स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए चंडीगढ़ का उदाहरण दिया और कहा कि स्टिल्ट प्लस फोर की व्यवस्था नहीं होने के कारण चंडीगढ़ आज भी रहने योग्य शहर बना हुआ है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की आवासीय निर्माण नीति और खरीद योग्य फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट का मानना है कि भवन उपनियमों के तहत जिस निर्माण की अनुमति दी जा रही है, उसे पॉलिसी के नाम पर मंजूरी देना उचित नहीं है। इससे निर्माण संहिता और शहरी नियोजन के निर्धारित मानकों का उद्देश्य ही प्रभावित हो रहा है।
नियमों के नाम पर नियमों से खिलवाड़ पर चिंता
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि निर्धारित नियमों से अधिक निर्माण की अनुमति देने के लिए शुल्क वसूलना शहरी नियोजन का समाधान नहीं हो सकता। अदालत के अनुसार, ऐसी नीतियां शहरों की बुनियादी व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। हरियाणा में आवासीय भूखंडों पर स्टिल्ट प्लस फोर निर्माण की नीति को लेकर अदालत ने सरकार से जवाबदेही की अपेक्षा जताई।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने खरीद योग्य FAR की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था निर्माण संहिता की मूल भावना को प्रभावित कर सकती है। भवन निर्माण के नियम केवल राजस्व जुटाने के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि उनका उद्देश्य शहरों में सुरक्षित, व्यवस्थित और सुविधाजनक आवासीय वातावरण तैयार करना होता है।
गुरुग्राम और नोएडा की स्थिति पर जताई चिंता
अदालत ने गुरुग्राम और नोएडा की मौजूदा शहरी स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि इन शहरों में तेजी से बढ़ते निर्माण और कमजोर नियोजन के कारण अव्यवस्था बढ़ रही है। इसके विपरीत चंडीगढ़ आज भी रहने योग्य शहरों में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
कोर्ट ने चंडीगढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां स्टिल्ट प्लस फोर जैसी व्यवस्था नहीं होने के कारण शहरी ढांचे पर अपेक्षाकृत कम दबाव है। अदालत की टिप्पणी का आशय यह था कि शहरों का विकास केवल ऊंची इमारतें खड़ी करने और अधिक आवासीय इकाइयां बनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए बुनियादी सुविधाओं और नागरिकों की जरूरतों को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।
पार्किंग की समस्या ने बढ़ाई परेशानी
हाईकोर्ट ने आवासीय क्षेत्रों में पार्किंग की समस्या पर भी गंभीर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, एक आवासीय इकाई में तीन से चार गाड़ियां खड़ी हो रही हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। इसका सीधा असर सड़कों पर दिखाई देता है।
पार्किंग की कमी के कारण वाहन सड़कों पर खड़े होते हैं, जिससे यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। साथ ही पड़ोसियों के बीच पार्किंग को लेकर विवाद और तनाव की स्थिति भी पैदा होती है। अदालत ने माना कि यदि किसी नीति के कारण आवासीय क्षेत्रों में वाहनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की जा रही, तो यह गंभीर शहरी नियोजन संबंधी समस्या है।
गुरुग्राम को आदर्श शहर बनाने की जरूरत
अदालत ने कहा कि दिल्ली के बेहद करीब होने के कारण गुरुग्राम को एक आदर्श शहर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए था। यहां नागरिकों को बेहतर आवास, पर्याप्त पार्किंग, सुचारु यातायात और अन्य बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं।
लेकिन अनियोजित निर्माण और शहरी विकास की कमियों के कारण शहर की व्यवस्था प्रभावित हो रही है। कोर्ट ने चिंता जताई कि यदि समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया तो आने वाले समय में नागरिकों की परेशानियां और बढ़ सकती हैं।
अगली सुनवाई पर सरकार को स्पष्ट करना होगा पक्ष
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हरियाणा के एडवोकेट जनरल पवन कुमार मुटनेजा को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई पर सरकार का पक्ष स्पष्ट करें। अदालत ने सरकार से अपेक्षा जताई कि वह उठाए गए सवालों और शहरी नियोजन से जुड़ी कमियों पर गंभीरता से विचार करे।
अब अगली सुनवाई में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि स्टिल्ट प्लस फोर निर्माण नीति, खरीद योग्य FAR और पार्किंग जैसी समस्याओं को लेकर उसका क्या रुख है। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से हरियाणा की आवासीय निर्माण नीति और शहरी विकास के नियमों पर एक बार फिर बहस तेज होने की संभावना है।

