हरियाणा में संविदा कर्मचारियों को 58 साल तक सेवा सुरक्षा देने का फैसला कोर्ट में चुनौती, सरकार को नोटिस
Yuva Haryana: हरियाणा में संविदा कर्मचारियों को 58 वर्ष की आयु तक सेवा सुरक्षा देने के सरकार के फैसले पर अब कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। नियमित भर्ती के अभ्यर्थियों ने इस व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संविदा कर्मचारियों को लंबे समय तक पदों पर बनाए रखने से नियमित भर्ती प्रक्रिया और चयनित अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। मामले में अदालत ने हरियाणा सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब प्रदेश सरकार हरियाणा कौशल रोजगार निगम (HKRN) के माध्यम से कार्यरत पात्र संविदा कर्मचारियों को सेवा सुरक्षा का लाभ देने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। सरकार की इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले कर्मचारियों को नौकरी से अचानक हटाए जाने की आशंका से सुरक्षा देना है। हालांकि, नियमित भर्ती की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों ने इस नीति के प्रभावों पर सवाल उठाए हैं।
क्या है सरकार की सेवा सुरक्षा योजना?
हरियाणा सरकार ने संविदा कर्मचारियों को सेवा सुरक्षा देने के लिए हरियाणा अनुबंध कर्मचारी (सेवा सुरक्षा) अधिनियम, 2024 बनाया था। इसके तहत निर्धारित पात्रता पूरी करने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति की निर्धारित आयु तक सेवा में बनाए रखने का प्रावधान किया गया है।
कानून के अनुसार, 15 अगस्त 2024 को सरकारी विभाग, बोर्ड, निगम या प्राधिकरण में कार्यरत पात्र संविदा, अस्थायी और आउटसोर्स कर्मचारी इस व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं। इसके लिए निर्धारित शर्तों में पांच वर्ष की पूर्णकालिक सेवा और अन्य पात्रता मानदंड शामिल हैं। कानून में कुछ श्रेणियों के कर्मचारियों को बाहर भी रखा गया है।
सरकार का अनुमान है कि इस व्यवस्था से करीब 1.20 लाख कर्मचारियों को लाभ मिल सकता है। पात्र कर्मचारियों को 58 वर्ष की आयु तक सेवा सुरक्षा देने की प्रक्रिया के तहत विभागों को दस्तावेजों का सत्यापन और पोर्टल पर आवश्यक जानकारी अपडेट करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
नियमित भर्ती के अभ्यर्थियों ने क्या उठाए सवाल?
याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति यह है कि जब सरकार नियमित पदों पर भर्ती की प्रक्रिया चलाती है, तब उन्हीं पदों पर पहले से कार्यरत संविदा कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखने की व्यवस्था से चयन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
अभ्यर्थियों का कहना है कि नियमित पदों के लिए विज्ञापन जारी होने और चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद योग्य उम्मीदवारों को नियुक्ति का अवसर मिलना चाहिए। यदि संविदा कर्मचारियों को सेवा सुरक्षा के नाम पर पदों पर बनाए रखा जाता है, तो नियमित भर्ती के लिए उपलब्ध पदों और नियुक्तियों को लेकर स्थिति जटिल हो सकती है।
उनकी ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि सेवा सुरक्षा और नियमित नियुक्ति के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। हालांकि, ये याचिकाकर्ताओं की दलीलें हैं। अदालत में इन पर अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।
नौकरी की सुरक्षा और नियमित भर्ती के बीच टकराव
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संविदा कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा और नियमित भर्ती दो अलग-अलग विषय हैं। सेवा सुरक्षा कानून के तहत पात्र कर्मचारियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार नौकरी में बने रहने का संरक्षण मिलता है, लेकिन इससे उन्हें स्वतः नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल जाता।
दूसरी ओर, नियमित भर्ती के अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार को रिक्त पदों पर पारदर्शी चयन प्रक्रिया के जरिए नियुक्तियां करनी चाहिए। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पहले के मामलों में भी संविदा कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा और नियमितीकरण से जुड़े सवाल सामने आ चुके हैं।
अब सरकार के जवाब पर टिकी नजरें
अदालत की ओर से नोटिस जारी होने के बाद अब हरियाणा सरकार को याचिका में उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखना होगा। सरकार को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि सेवा सुरक्षा योजना लागू करते समय नियमित भर्ती और चयनित अभ्यर्थियों के हितों का ध्यान किस तरह रखा जा रहा है।
फिलहाल अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है। नोटिस जारी होना याचिका में लगाए गए आरोपों को सही ठहराना या सरकार की नीति पर रोक लगना नहीं है। मामले में आगे होने वाली सुनवाई और सरकार के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि 58 वर्ष तक सेवा सुरक्षा देने की व्यवस्था पर अदालत का क्या रुख रहता है।

