Yuva Haryana : भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली पर आज संकट मंडरा रहा है। सदियों से हमारे पर्यावरण की ढाल बनी इस प्राचीन पहाड़ी के भविष्य पर क्यों संकट खड़ा हुआ है, चलिए आपको बताते है…
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने अरावली की पहचान को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। इससे पहले भ्रम की स्थिति बनी हुई थी कि आखिर किन पहाड़ियों को अरावली माना जाए ?
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय, एफएसआई, राज्यों के वन विभाग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अपनी समिति के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक नई समिति बनाई। इस समिति ने साल 2025 में अपनी एक रिपोर्ट अदालत को सौंपी।
20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति की रिपोर्ट को आधार बनाते केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा मानने के आदेश दिए।
इसके बाद देशभर में खासकर राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का विरोध हो रहा है, क्योंकि सभी का मानना है कि इससे 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली सभी पहाड़ियां खनन और अन्य गतिविधियों के लिए खुल सकती है, जो कि पूरी श्रृंखला के पारिस्थितिक संतुलन को तोड़ देगा।
एक प्रमुख समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार हरियाणा के मेवात की अरावली पहाड़ियों पर मंडराए संकट के चलते 40 गांवों के वजूद पर खतरा है। ऐसे में क्षेत्र के लोग कड़ा रुख अपनाने को मजबूर है।
मेवात आरटीआई मंच द्वारा नगीना नायब तहसीलदार के माध्यम से राष्ट्रपति, पीएम, गृह मंत्री, राज्यपाल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को ज्ञापन सौंपा गया है और इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई गई है।
नूंह से सटे तिजारा, खैरथल, किशनगढ़ बास, अलवर, जुरहेड़ा, पहाड़ी, गोपालगढ़ और कामां क्षेत्र के करीब 60 गांव इस फैसले के बाद खासा चिंतित है। एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान और हरियाणा के छह जिलों के 100 गांवों पर संकट मंडरा रहा है।
ऐसे में मेवात आरटीआई मंच का कहना है कि नूंह के 13 गांव ऐसे है, जहां अरावली पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है। इन क्षेत्रों में खनन का काम शुरू हुआ तो गांवों का अस्तित्व ही नहीं बल्कि मंदिर, मस्जिदें, दरगाहें और किले खत्म होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।
अरावली श्रृंखला के आस-पास रहने वाले लोगों को मानना है कि पूरे उत्तर भारत में अरावली की पहाड़ियां प्राकृतिक सुरक्षा कवच है और इसे कमजोर करना पर्यावरण पर बड़ी चोट करने समान है।
आपको बता दे कि अरावली पर्वतमाला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर में फैली हुई है। राजस्थान से आने वाली रेगिस्तान की धूल को दिल्ली एनसीआर तक पहुंचने से ये पहाड़िया ही रोकती है। भूजल रिचार्ज और तापमान संतुलन में भी इस पर्वतामाला का अहम रोल रहता है। ऐसे में सुप्रीम को अपने फैसले पर पुनर्विचर करने की मांग उठ रही है।



