Yuva Haryana: प्रदेशभर के आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मिलने वाले पोषण आहार को लेकर एक गंभीर स्थिति सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 25 हजार से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों में पिछले दो सालों से न तो गुड़ पहुंचा है और न ही चीनी। स्थिति यह है कि पौष्टिक आहार की कमी के चलते नौनिहालों को हर हफ्ते केवल नमकीन खाना खाने को मजबूर होना पड़ रहा है। संतुलित और मीठा भोजन न मिलने के कारण करीब 7 लाख बच्चों और 2.5 लाख से अधिक पंजीकृत गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया है, जिससे प्रदेश में गंभीर एनीमिया और कुपोषण तेजी से फैल रहा है।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट: पोषण के अभाव में बढ़ रहा मौत का आंकड़ा
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, उचित पोषण और देखभाल के अभाव के कारण केवल एक साल के भीतर राज्य में 5556 शिशुओं की अकाल मौत हो चुकी है। जानकारों का कहना है कि बच्चों को मां का दूध न मिलने और सही पोषण न मिलने के कारण उनमें कुपोषण और खून की भारी कमी (एनीमिया) हो रही है।
दूध और खीर के पैकेटों की भी भारी किल्लत
आंगनबाड़ी केंद्रों में सिर्फ गुड़-चीनी ही नहीं, बल्कि बच्चों के लिए आने वाले रोस्टेड मिल्क और खीर के पैकेटों की आपूर्ति भी समय पर नहीं हो पा रही है। कई केंद्रों पर सूखी खाद्य सामग्री इतनी घटिया और पुरानी होती है कि वह बच्चों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती है। कुरुक्षेत्र की एक आंगनबाड़ी वर्कर ने बताया कि पहले केंद्रों में सप्ताह में दो मीठे गुलगुले या मीठा दलिया बनाया जाता था, लेकिन पिछले दो साल से चीनी और गुड़ बंद होने के कारण यह व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ गई है।
महिलाओं और बच्चों के बयान: सामने आए जमीनी मामले
केस 1 (गर्भावस्था में नहीं मिला राशन): कैथल की पूनम ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों से उन्हें गर्भावस्था के दौरान कभी भी विशेष पोषण किट या ठीक से राशन नहीं मिला, और अब दो साल बीत जाने के बाद भी उनकी बेटी को वहां से कोई नियमित राशन नहीं मिल पा रहा है।
केस 2 (गर्भवती महिलाओं की अनदेखी): कुरुक्षेत्र की निवासी रीना देवी ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों में गर्भवती महिलाओं के पोषण को लेकर कोई विशेष सुविधा नहीं मिलती है और कभी-कभार ही खुला राशन मिलता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: हर तीसरे बच्चे में खून की कमी
शिशु विशेषज्ञ डॉ. अनित स्वामी के अनुसार, इस समय नवजात शिशुओं में एनीमिया की समस्या बहुत अधिक देखने को मिल रही है। ओपीडी में आने वाले हर तीसरे बच्चे में खून की कमी पाई जा रही है, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में खून चढ़ाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि जन्म से लेकर कम से कम 6 महीने तक बच्चों को केवल मां का दूध ही पिलाना चाहिए ताकि कुपोषण से बचाव हो सके।
विभाग का पक्ष
चाइल्ड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर थानेसर, कुसुम कंबोज ने इस मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों में मीठा खाना बनाना ऊपर से ही बंद किया गया है, जिसके चलते केंद्रों में चीनी और गुड़ की सप्लाई नहीं आ रही है।

