Yuva Haryana: आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) घोटाले से सबक लेते हुए हरियाणा सरकार ने वित्तीय पारदर्शिता को लेकर बड़ा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने ‘स्थानीय लेखा परीक्षा अधिनियम, 2026’ लागू कर दिया है। इस कानून के तहत नगर निगम, नगर परिषद, नगरपालिका, जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायतों के साथ-साथ राज्य विश्वविद्यालयों, हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड और अन्य सरकारी या सहायता प्राप्त संस्थानों को नियमित ऑडिट के दायरे में लाया गया है।
गलत भुगतान और लापरवाही पर सीधे अधिकारी से वसूले जाएंगे पैसे
नए कानून के तहत स्थानीय लेखा विभाग के निदेशक को यह अधिकार होगा कि वह गलत भुगतान को रोक सके। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या कदाचार के कारण सरकारी धन का नुकसान होता है, तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति से उस राशि की वसूली की जाएगी।
तय की गई रकम को 1 महीने के भीतर जमा करना अनिवार्य होगा; ऐसा न करने पर इसे भू-राजस्व (Land Revenue) के बकाया की तरह वसूला जाएगा। हालाँकि, राहत के तौर पर प्रभावित व्यक्ति निदेशक के फैसले के खिलाफ 1 महीने के भीतर प्रशासनिक सचिव के पास अपील कर सकता है।
3 महीने में हिसाब और 6 महीने में पूरा करना होगा ऑडिट
कानून के तहत सभी निकायों को वित्तीय वर्ष समाप्त होने के 3 महीने के भीतर अपने खाते ऑडिट के लिए तैयार करने होंगे।
फंड रोका जा सकता है: समय पर हिसाब न देने पर निकायों को मिलने वाली सरकारी राशि रोकने की सिफारिश की जा सकती है।
ऑडिट समयसीमा: ऑडिट सामान्यतः 6 महीने के भीतर पूरा करना होगा।
दस्तावेज व बिल की जाँच: ऑडिटर को सभी बिल-वाउचर, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, रिटर्न और पत्राचार मांगने का पूरा अधिकार होगा। जरूरत पड़ने पर संबंधित कर्मचारियों या ठेकेदारों को सीधे बुलाकर जवाब माँगा जा सकेगा।
जुर्माना: आदेशों की अवहेलना करने पर ₹1,000 से ₹5,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
दायरा: कौन-कौन से संस्थान आए अंतर्गत?
इस कानून की अनुसूची में नगर निगम, नगर परिषद, नगर समितियां, जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायतें शामिल हैं। इनके अलावा:
- चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हिसार)
- महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज
- हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड (भिवानी)
- सभी राज्य विश्वविद्यालय
- सरकारी व सहायता प्राप्त इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों के स्थानीय फंड
अब नहीं दबेगी ऑडिट आपत्ति, सार्वजनिक रिकॉर्ड का बनेगी हिस्सा
ऑडिट रिपोर्ट मिलने के बाद संबंधित निकाय को 2 महीने के भीतर गड़बड़ी या आपत्ति को दूर करना होगा। इसकी रिपोर्ट निदेशक को सौंपी जाएगी।
खास बात यह है कि ऑडिट में सामने आई अनियमितताएँ, उस पर दिया गया जवाब और निदेशक का अंतिम आदेश संबंधित संस्था की अगली प्रशासनिक रिपोर्ट में प्रकाशित किया जाएगा। यदि ऑडिट के दौरान किसी प्रकार का आपराधिक गबन या धोखाधड़ी की आशंका जताई जाती है, तो निदेशक तुरंत सरकार को सूचित कर मामले की आपराधिक या सतर्कता जांच की सिफारिश कर सकेंगे।

