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मोरनी किला
हरियाणा न्यूज़

मोरनी किले की विरासत पर मंडराया खतरा

Bhawana Vats
Last updated: November 3, 2026 12:23 pm
Bhawana Vats - Editor
Published: November 3, 2026
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मोरनी किला
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1857 की क्रांति का गवाह मोरनी किला बदहाल, 2017 में बना नेचर म्यूजियम अब दीमक की चपेट में

Contents
1857 की क्रांति से जुड़ा है किले का इतिहास2017 में नेचर म्यूजियम के रूप में मिला नया रूपदीमक, मकड़ी के जाले और सफाई की कमी बनी परेशानीपर्यटन की संभावनाएं, लेकिन रखरखाव जरूरी

Yuva Haryana: हरियाणा के पंचकूला जिले की मोरनी पहाड़ियों में स्थित ऐतिहासिक मोरनी किला प्रदेश की विरासत और इतिहास का अहम हिस्सा है। कभी युद्धों और सत्ता संघर्षों का गवाह रहा यह करीब 200 साल पुराना किला आज रखरखाव की कमी से जूझ रहा है। किले के अंदर बनाए गए नेचर म्यूजियम एंड लर्निंग सेंटर की दीवारों और लकड़ी की छतों पर दीमक फैलने, सफाई की कमी और अन्य अव्यवस्थाओं के कारण इसकी खूबसूरती प्रभावित हो रही है। यहां पहुंचने वाले पर्यटक भी बदहाल स्थिति देखकर निराश लौट रहे हैं।

इस किले को वर्ष 2017 में वन विभाग ने नेचर म्यूजियम और लर्निंग सेंटर के रूप में विकसित किया था। इसका उद्देश्य पर्यटकों और खासकर बच्चों को हरियाणा के जंगलों, वन्यजीवों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। लेकिन जिस जगह को पर्यटन और शिक्षा का नया केंद्र बनाया गया था, वही अब नियमित देखभाल की कमी के कारण अपनी चमक खोता जा रहा है।

1857 की क्रांति से जुड़ा है किले का इतिहास

मोरनी किले का इतिहास कई सदियों पुराने क्षेत्रीय सत्ता संघर्षों से जुड़ा बताया जाता है। मोरनी क्षेत्र पहले छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था। यहां के शासक ठाकुर राजपूत थे और उनका संबंध सिरमौर रियासत से था।

एक ही जमीन से दो बार धान बिक्री का आरोप

समय के साथ इस क्षेत्र पर अलग-अलग शासकों का अधिकार रहा। वर्ष 1810 में गोरखा शासकों ने इस इलाके पर कब्जा किया। बाद में अंग्रेजों ने भी यहां अपना प्रभाव स्थापित किया। 26 अक्टूबर 1816 को अंग्रेजों ने यह क्षेत्र मीर वंश के मीर जफर खान को सौंप दिया था।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मीर वंश के शासकों ने स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की थी। स्थानीय इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक, इससे नाराज अंग्रेजों ने किले पर तोपों से हमला कर उसे नुकसान पहुंचाया था। यही वजह है कि मोरनी किले को 1857 की क्रांति से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत के रूप में भी देखा जाता है।

2017 में नेचर म्यूजियम के रूप में मिला नया रूप

किले को पर्यटन के लिहाज से नया जीवन देने के लिए हरियाणा वन विभाग ने वर्ष 2017 में इसे नेचर म्यूजियम एंड लर्निंग सेंटर में बदलने की योजना तैयार की। इस परियोजना में मुंबई, अहमदाबाद और चंडीगढ़ सहित अलग-अलग शहरों के 100 से अधिक कलाकारों, डिजाइनरों और मॉडल निर्माताओं ने काम किया।

म्यूजियम के अंदर हरियाणा की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को दर्शाने के लिए आकर्षक मूर्तियां, गुफाओं जैसे मॉडल, दीवारों पर चित्रकारी, गुंबद और 3D कलाकृतियां बनाई गईं। यहां वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, जंगलों की अहमियत, वन विभाग की संरक्षण योजनाओं और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों को प्रदर्शित किया गया। इसका मकसद पर्यटकों को मनोरंजन के साथ प्रकृति के प्रति जागरूक करना था।

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दीमक, मकड़ी के जाले और सफाई की कमी बनी परेशानी

स्थानीय रिपोर्टों और पर्यटकों की शिकायतों के अनुसार, म्यूजियम की दीवारों और लकड़ी के हिस्सों में दीमक लगने की समस्या सामने आई है। कई जगह मकड़ी के जाले दिखाई देते हैं और नियमित सफाई नहीं होने से म्यूजियम की सुंदरता प्रभावित हो रही है। बारिश के मौसम में दीवारों में बिजली का करंट आने की शिकायत भी पहले सामने आई थी।

पर्यटकों का कहना है कि इतनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारत की नियमित देखभाल होनी चाहिए। कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि म्यूजियम के रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट, प्रशिक्षित कर्मचारी और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था की जाए। वन विभाग की ओर से पहले बजट के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखे जाने की जानकारी भी सामने आई थी।

पर्यटन की संभावनाएं, लेकिन रखरखाव जरूरी

मोरनी पहाड़ियां प्राकृतिक सुंदरता, झीलों, हरियाली और ट्रेकिंग के लिए जानी जाती हैं। हरियाणा पर्यटन विभाग भी मोरनी और टिक्कर ताल को प्रमुख पर्यटन स्थलों के रूप में प्रचारित करता है। ऐसे में ऐतिहासिक किले और नेचर म्यूजियम का बेहतर रखरखाव क्षेत्र के पर्यटन को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।

अब जरूरत है कि संबंधित विभाग किले की स्थिति का निरीक्षण कर मरम्मत, दीमक नियंत्रण, सफाई और सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं। यदि समय रहते इसकी देखभाल नहीं की गई तो ऐतिहासिक महत्व और पर्यटन क्षमता वाली यह धरोहर धीरे-धीरे और खराब हो सकती है।

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