हरियाणा की MBBS बॉन्ड पॉलिसी से परेशान छात्र, नौकरी पर स्पष्टता नहीं; अब कोर्ट जाने की तैयारी
Yuva Haryana: हरियाणा में एमबीबीएस बॉन्ड पॉलिसी को लेकर मेडिकल छात्रों और राज्य सरकार के बीच विवाद लगातार बना हुआ है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई पूरी कर चुके छात्र अब तक रोजगार और बॉन्ड की शर्तों को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं मिलने से परेशान हैं। छात्रों का कहना है कि सरकार ने बॉन्ड पॉलिसी के तहत नौकरी और सेवा से जुड़ी शर्तों को लेकर स्पष्ट व्यवस्था नहीं की है। ऐसे में अब वे कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं।
2020-21 बैच के कई छात्र फरवरी 2026 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, लेकिन इसके बाद भी रोजगार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई। छात्रों ने संबंधित अधिकारियों और मेडिकल कॉलेजों के प्रबंधन से संपर्क किया तथा कई बार ईमेल के माध्यम से अपनी समस्याएं उठाईं। इसके बावजूद उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिलने का आरोप है।
2020 में लागू हुई थी बॉन्ड पॉलिसी
हरियाणा सरकार ने नवंबर 2020 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के लिए बॉन्ड पॉलिसी लागू की थी। इसका उद्देश्य मेडिकल स्नातकों को सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सेवा देने के लिए प्रोत्साहित करना और राज्य में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाना था।
दिसंबर 2022 में सरकार ने इस नीति में संशोधन करते हुए इसे ‘स्टेट सर्विस इंसेंटिव बॉन्ड पॉलिसी’ के रूप में अधिसूचित किया। संशोधित नीति में बॉन्ड से जुड़ी अवधि और वित्तीय शर्तों में बदलाव किए गए। इसके तहत सरकारी क्षेत्र में निर्धारित सेवा देने पर सरकार की ओर से शिक्षा ऋण की किस्तों का भुगतान करने का प्रावधान भी रखा गया।
हालांकि, छात्रों का कहना है कि नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन से जुड़े कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं। उनका तर्क है कि बॉन्ड की शर्तें लागू करने से पहले नौकरी, वेतन, पोस्टिंग और सेवा की प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
595 मेडिकल छात्रों का मामला
हरियाणा के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 2020-21 बैच के करीब 595 एमबीबीएस छात्र इस नीति के दायरे में आते हैं। छात्रों ने सरकार और संबंधित विभाग के सामने अपनी चिंताएं रखी हैं।
विद्यार्थियों ने मांग की है कि उन्हें लिखित रूप में बताया जाए कि सरकारी नौकरी कब और किस प्रक्रिया के तहत मिलेगी। इसके अलावा, वेतनमान, कार्यस्थल पर तैनाती, सेवा की शर्तों और बॉन्ड से बाहर निकलने की प्रक्रिया पर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश चाहते हैं।
छात्रों के अनुसार, यदि रोजगार की स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो उनके लिए आगे की पढ़ाई और करियर की योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। वे चाहते हैं कि सरकार उनकी समस्याओं पर समयबद्ध निर्णय ले।
मूल दस्तावेजों को लेकर भी उठे सवाल
विवाद का एक अहम मुद्दा छात्रों के मूल शैक्षणिक दस्तावेजों से जुड़ा रहा है। विद्यार्थियों का कहना है कि डिग्री, मार्कशीट और इंटर्नशिप प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज आगे की पढ़ाई, नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं में आवेदन के लिए जरूरी हैं।
इस मुद्दे पर मार्च 2026 में हरियाणा चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशालय (DMER) ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों को 2020 बैच के विद्यार्थियों के मूल दस्तावेज लौटाने और एमबीबीएस से संबंधित आवश्यक प्रमाणपत्रों की सत्यापित स्कैन कॉपी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
हालांकि, छात्रों की मुख्य चिंता केवल दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि बॉन्ड के तहत रोजगार और सरकारी सेवा से जुड़े नियमों पर भी स्पष्टता दी जाए, ताकि उनका भविष्य अनिश्चितता में न रहे।
हाईकोर्ट जाने की तैयारी
छात्रों ने अब कानूनी कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। वे संबंधित विभागों और अधिकारियों से जवाब मांगने के बाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख करने पर विचार कर रहे हैं।
छात्रों की संयुक्त एक्शन कमेटी के सदस्य डॉ. अक्षत के मुताबिक, यह केवल दस्तावेजों का मामला नहीं, बल्कि उन डॉक्टरों के भविष्य से जुड़ा सवाल है जिन्होंने मेहनत से मेडिकल शिक्षा पूरी की है। छात्रों ने पहले भी मेडिकल कॉलेजों के डीन और निदेशकों सहित संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया था।
अब देखना होगा कि सरकार और संबंधित विभाग छात्रों की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं। बॉन्ड पॉलिसी के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए रोजगार की प्रक्रिया, सेवा की शर्तों और छात्रों के अधिकारों पर स्पष्टता जरूरी है। फिलहाल, छात्र चाहते हैं कि उनके सवालों का लिखित और संतोषजनक जवाब दिया जाए, ताकि वे अपने भविष्य को लेकर निर्णय ले सकें।

