Yuva Haryana: हरियाणा में जूनियर बेसिक ट्रेनिंग (JBT) पाठ्यक्रम के प्रति विद्यार्थियों का रुझान तेज़ी से घटता नज़र आ रहा है। प्रदेश भर में जेबीटी में रुचि कम होने के कारण अब डी.एल.एड/जेबीटी शिक्षण संस्थानों के सामने अस्तित्व और वित्तीय प्रबंधन की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी जिले के कुल 88 संस्थानों में निर्धारित 4,850 सीटों में से केवल 1,315 सीटों पर ही दाखिले हो सके हैं, जबकि शेष 3,535 सीटें (लगभग 73%) खाली रह गई हैं। संपूर्ण हरियाणा प्रदेश की बात करें तो 342 संस्थानों की 18,500 सीटों में से सिर्फ 5,900 सीटों पर ही प्रवेश हुआ है, जिसके चलते कुल सीटों का लगभग 68% हिस्सा खाली रह गया है।
आंकड़ों की प्रमुख बातें:
संपूर्ण हरियाणा की स्थिति: प्रदेश के 342 शिक्षण संस्थानों में कुल 18,500 सीटें निर्धारित थीं, लेकिन केवल 5,900 सीटों पर दाखिले हुए और 12,600 सीटें (लगभग 68%) खाली रह गईं।
महेंद्रगढ़ व रेवाड़ी जिले की स्थिति: यहाँ के 88 संस्थानों में 4,850 सीटों में से केवल 1,315 सीटों पर ही दाखिला हो सका, जबकि 3,535 सीटें खाली रह गईं।
- प्रवेश प्रक्रिया बंद: विद्यार्थियों के विकल्प हुए सीमित
जेबीटी शिक्षक बनने का सपना देख रहे अभ्यर्थियों के लिए प्रवेश प्रक्रिया का समय पर पूरा होना अनिवार्य होता है। निर्धारित समय-सीमा (26 जून) के भीतर सीटें न भरने और बाद में दोबारा प्रवेश का अवसर न मिलने से विद्यार्थियों के विकल्प बहुत सीमित हो गए हैं।
संस्थानों ने रिक्त सीटों पर पुनः दाखिले की अनुमति के लिए विभागीय स्तर पर गुहार लगाई और अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाया, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिल सकी। प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो जाने से अब खाली सीटों पर किसी भी प्रकार के दाखिले का रास्ता बंद हो गया है।
- संस्थानों के सामने खर्च और संचालन की चुनौती
शिक्षण संस्थानों को संचालित करने के लिए भवन, स्टाफ/शिक्षकों का वेतन, प्रशिक्षण सुविधाएं और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भारी खर्च करना पड़ता है।
- सीटें खाली रहने के बावजूद यह बुनियादी परिचालन खर्च (Operational Cost) ज्यों का त्यों बना रहता है।
- निर्धारित क्षमता के मुकाबले विद्यार्थियों की संख्या अत्यंत कम होने से संस्थानों की आय सीधे तौर पर प्रभावित हुई है।
- यदि आगामी सत्रों में भी यही स्थिति बनी रहती है, तो कई संस्थानों के लिए अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
- सरकार और शिक्षा विभाग के राजस्व पर असर
विद्यार्थियों की कम संख्या के कारण केवल निजी शिक्षण संस्थान ही नहीं, बल्कि सरकार और शिक्षा विभाग के राजस्व (Tax/Fees Revenue) पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
बड़ा सवाल: खाली सीटों को लेकर संस्थानों की मांग और विभागीय फैसलों के बीच तालमेल न बैठने से यह सवाल उठ रहा है कि प्रवेश प्रक्रिया में विद्यार्थियों की वास्तविक मांग, संस्थानों की क्षमता और निर्धारित समय-सीमा के बीच बेहतर सामंजस्य कैसे बनाया जाए?
अब अगले सत्र की प्रवेश प्रक्रिया पर टिकीं उम्मीदें
चालू सत्र में राहत न मिलने के कारण अब निजी व सरकारी संस्थानों की नजरें अगले प्रवेश सत्र पर टिक गई हैं।
- विशेषज्ञों का मानना है कि अब अगले सत्र में सीटों को भरने के लिए नई रणनीति अपनानी होगी।
- विद्यार्थियों के बीच जेबीटी पाठ्यक्रम के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी।
- प्रवेश प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने पर ध्यान देना आवश्यक है।
हरियाणा में 68% सीटों का खाली रह जाना सिर्फ एक वित्तीय समस्या नहीं है, बल्कि यह इस बात का भी गंभीर संकेत है कि शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों (Teacher Training Courses) के प्रति युवाओं की मांग और रुचि में बड़ा बदलाव आ रहा है।

