Yuva Haryana: सरकारी तंत्र की लापरवाही के खिलाफ अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन कर देश भर में सुर्खियों में आए दूलीचंद अब इस दुनिया में नहीं रहे। रोहतक जिले के गांधरा गांव में 106 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम यात्रा किसी आम यात्रा की तरह नहीं, बल्कि एक बारात की तरह निकाली गई, जिसमें अर्थी को गुब्बारों से सजाया गया था और ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ युवाओं ने नृत्य किया। उनके बड़े बेटे ने उनकी चिता को मुखाग्नि दी।
क्या था पूरा मामला?
दो मार्च 2022 को दूलीचंद की बुढ़ापा पेंशन अचानक आनी बंद हो गई थी। सरकारी कागजों में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। इस बात से परेशान होकर वह करीब छह महीने तक अधिकारियों के चक्कर काटते रहे, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने खुद को जिंदा साबित करने के लिए एक बेहद अनोखा और यादगार रास्ता चुना।
जब दूल्हा बनकर निकले थे दूलीचंद
लगभग 102 वर्ष की उम्र में दूलीचंद ने चश्मा पहना, रथ पर सवार हुए और हाथों में ‘थारा फूफा अभी जिंदा है’ लिखी तख्तियां लेकर उपायुक्त कार्यालय पहुंच गए। उनका यह अनोखा विरोध प्रदर्शन पूरे हरियाणा में चर्चा का विषय बन गया था। इस विरोध के बाद प्रशासन हरकत में आया और विशेष शिविर लगाकर न सिर्फ उनकी पेंशन बहाल की गई, बल्कि क्षेत्र के अन्य बुजुर्गों को भी इसका लाभ मिला।
भरा-पूरा परिवार छोड़ गए पीछे
दूलीचंद अपने पीछे एक बड़ा और हंसता-खेलता परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में छह बेटे और चार बेटियां हैं, और कुल सदस्यों की संख्या लगभग 70 है, जिसमें पौत्र-पौत्रियां और प्रपौत्र-प्रपौत्रियां शामिल हैं। उनके जीवन पर आधारित संघर्ष और आंदोलन पर आगे चलकर एक हरियाणवी फिल्म भी बनाई गई थी, जिसको लेकर कानूनी विवाद भी कोर्ट में विचाराधीन रहा है।

