Yuva Haryana: हरियाणा में नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों की पोल खोलती एक परेशान करने वाली रिपोर्ट सामने आई है। राज्य में नशामुक्ति के बाद मरीजों की सही ट्रैकिंग न होने के कारण युवा इलाज कराने के बाद दोबारा नशे की दलदल में फंस रहे हैं। विधानसभा में पेश रिपोर्ट के अनुसार, बीते 5 सालों में 18 से 30 वर्ष की उम्र के 1.84 लाख युवाओं को नशामुक्ति केंद्रों में भर्ती कराया गया, लेकिन इनमें से केवल 50,628 युवाओं की ही नशे की लत छूट पाई।
सरकार ने पिछले 5 वर्षों में नशा मुक्ति अभियान पर 8.42 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
134 केंद्र रजिस्टर्ड, फिर भी व्यवस्था ध्वस्त
प्रदेश में कुल 134 नशामुक्ति केंद्र पंजीकृत हैं, जिनमें 26 सरकारी, 9 सरकारी सहायता प्राप्त और 99 प्राइवेट नशा मुक्ति केंद्र शामिल हैं। इन सेंटरों में चिट्टा, स्मैक, अफीम, भुक्की, शराब और इंजेक्शन से नशा करने वाले मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।
इसके बावजूद, अधिकांश सरकारी सेंटरों की स्थिति बेहद दयनीय है:
डॉक्टरों की भारी कमी: करनाल, कैथल और कालांवाली के सरकारी केंद्रों में मनोचिकित्सक (Psychiatrists) ही तैनात नहीं हैं। कुरुक्षेत्र में स्वीकृत 3 मनोचिकित्सकों के पदों पर केवल 1 ही कार्यरत है।
दवाओं और किट का संकट: महेंद्रगढ़ में मरीजों को दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। करनाल और हिसार के केंद्रों में यूरिन ड्रग डिटेक्शन किट तक उपलब्ध नहीं हैं।
सुरक्षा का अभाव: कैथल में आक्रामक मरीजों पर काबू पाने के लिए सुरक्षा गार्ड तक तैनात नहीं किए गए हैं।
जिलों से ज़मीनी रिपोर्ट (Ground Reality)
- सिरसा: 129 नशा पीड़ित एचआईवी संक्रमितसिरसा के नागरिक अस्पताल में 50 बेड के नशामुक्ति केंद्र में 40 मरीज भर्ती हैं और 210 मरीज वेटिंग लिस्ट में हैं।
- आरोप है कि जाली तोड़कर वार्ड के अंदर तक चिट्टा और नशीली गोलियां पहुंचाई जा रही हैं।
- बीते 11 सालों में ओपीडी 28 गुना बढ़कर 38,865 तक पहुंच गई है।
- ओएसटी (OST) सेंटर में पंजीकृत 1,297 पीड़ितों में से 129 मरीज एचआईवी संक्रमित पाए गए हैं।
- कालांवाली केंद्र में न तो मनोचिकित्सक हैं और न ही योग शिक्षक।
- यमुनानगर: इलाज के बाद 25% मरीज दोबारा नशे में
- यमुनानगर जिले में 4 नशामुक्ति केंद्र हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में एक भी सेंटर नहीं है।
- जिला अस्पताल के एडिक्शन ट्रीटमेंट फैसिलिटी (ATF) में 2024 से अब तक 3,800 से अधिक मरीज इलाज करा चुके हैं, जिनमें 60% से अधिक युवा हैं।
- 20 बेड का आईपीडी (IPD) वार्ड 24 घंटे फुल रहता है।
- डिस्चार्ज होने के बाद फॉलोअप और ट्रैकिंग न होने के कारण 25 प्रतिशत मरीज दोबारा नशे की लत में पड़ जाते हैं।
- कुरुक्षेत्र: पीएचसी/सीएचसी स्तर पर सुविधाओं का अभाव
- कुरुक्षेत्र और शाहाबाद के केंद्रों में 3 मनोचिकित्सकों की जगह सिर्फ 1 डॉक्टर कार्यरत है।
- प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC/CHC) पर यूरिन ड्रग डिटेक्शन किट और अलग रेफरल एंबुलेंस मौजूद नहीं है।
- डिस्चार्ज के बाद मरीजों की निगरानी का कोई ठोस सरकारी सिस्टम मौजूद नहीं है।
निजी सेंटरों में 1.50 लाख तक की वसूली
सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी का सीधा फायदा निजी नशामुक्ति केंद्र उठा रहे हैं। प्राइवेट सेंटरों में इलाज के नाम पर नशा पीड़ितों और उनके परिवारों से ₹1.50 लाख तक की भारी-भरकम राशि वसूली जा रही है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉ. प्रशांत कुमार (मनोचिकित्सक):
“नशे के लिए एक ही सुई या सिरेंज का बार-बार इस्तेमाल करना बेहद खतरनाक है। इससे संक्रमित व्यक्ति के खून के संपर्क में आने से एचआईवी के अलावा हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी जैसे गंभीर और घातक संक्रमण फैलते हैं।”
“ओएसटी (ओपिऑइड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी) का मुख्य उद्देश्य मरीज को इंजेक्शन वाले नशे से हटाकर दवा आधारित उपचार पर लाना है। नशामुक्ति केवल शरीर को डिटॉक्स (Detox) करने तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक काउंसिलिंग, नियमित फॉलोअप, माहौल व संगत में बदलाव और परिवार के मजबूत सहयोग की सख्त जरूरत होती है।”

