Yuva Haryana: ‘शॉर्टकट पेरेंटिंग’ अब बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ने लगी है। रोने से रोकने या व्यस्त रखने के लिए खिलौने की तरह थमाया गया स्मार्टफोन बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को रोक रहा है। रोहतक समेत प्रदेशभर में बच्चों में मोबाइल और स्क्रीन की लत (Screen Addiction) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के अनुसार, बच्चों के बेहतर शारीरिक व मानसिक विकास के लिए उन्हें रोजाना कम से कम 150 से 300 मिनट तक खेलकूद या अन्य फिजिकल एक्टिविटीज में बिताना चाहिए। हालांकि, ज़मीनी हकीकत यह है कि बच्चे मैदानों से दूर होकर रोजाना 6 से 7 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिता रहे हैं।
नतीजतन न तो उनका शारीरिक विकास हो पा रहा है और न ही मानसिक। पढ़ाई का ग्राफ लगातार गिर रहा है और बच्चे चिड़चिड़े व हिंसक हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार, इस गंभीर खतरे के जिम्मेदार खुद मातापिता हैं, जो अपनी व्यस्तता या काम से पीछा छुड़ाने के लिए बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन और डिजिटल गैजेट्स थमा देते हैं।
PGIMS रोहतक में हर महीने आ रहे 5060 मामले
PGIMS रोहतक की मनोचिकित्सक OPD में हर महीने ऐसे 4 से 5 गंभीर मामले सामने आ रहे हैं, जहां मातापिता बच्चे का फोन छुड़ाने के अपने तमाम प्रयासों में असफल हो चुके हैं। यदि शहर के अन्य सरकारी और निजी अस्पतालों की बात करें तो यह आंकड़ा 50 से 60 तक पहुंच गया है। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे बच्चों का इलाज दवाइयों के साथसाथ काउंसलिंग और फिजिकल एक्टिविटीज की मदद से किया जा रहा है।
मोबाइल की लत के 3 गंभीर मामले:
केस 1: चुप कराने की ‘शॉर्टकट’ आदत पड़ी भारी
5 साल के बच्चे के पिता नौकरी में व्यस्त थे और मां घर के कामकाज में। बच्चा रोए नहीं, इसलिए मां उसे बहलाने के लिए फोन थमा देती थी। धीरेधीरे मासूम को स्क्रीन की ऐसी लत लगी कि उसकी फिजिकल एक्टिविटीज और बाहर खेलना पूरी तरह बंद हो गया। इसका सीधा असर उसके मानसिक विकास पर पड़ा।
केस 2: 10वीं का छात्र 8 घंटे खेलता था मोबाइल गेम
10वीं कक्षा का एक छात्र स्कूल से आते ही मोबाइल गेमिंग में डूब जाता था। उसका डेली स्क्रीन टाइम 7 से 8 घंटे पहुंच गया। नतीजा यह हुआ कि उसने स्कूल का होमवर्क करना बंद कर दिया और पढ़ाई का ग्राफ गिरता चला गया। परेशान मां चार महीने पहले उसे मनोचिकित्सक के पास लेकर आईं, जहां अब उसकी काउंसलिंग की जा रही है।
केस 3: रील्स की लत से डिप्रेशन में पहुंची 12 साल की बच्ची
12 साल की एक स्कूली बच्ची को इंस्टाग्राम रील्स देखने का चस्का लग गया। उसने दोस्तों से मिलना और बाहर खेलना बंद कर दिया। जब उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया, तो परिजन उसे अस्पताल लाए। लंबे मनोरोग इलाज के बाद बच्ची अब सामान्य है, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक अगर मातापिता ने उसे दोबारा अकेला छोड़ा तो यह लत फिर हावी हो सकती है।
प्रो. डॉ. हितेश खुराना (मनोचिकित्सक, PGIMS रोहतक)
बच्चों की मोबाइल की आदत छुड़ाने के लिए घर से करें शुरुआत:
- खुद सीमित करें फोन का इस्तेमाल: बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं। मातापिता को उनके सामने खुद फोन का इस्तेमाल कम करना होगा।
- शॉर्टकट न अपनाएं: बच्चे के रोने या जिद करने पर फोन थमाने की गलती बिल्कुल न करें।
- समय दें और खुलकर बात करें: फोन देने के बजाय बच्चे को समय दें। रोजाना रात को सोने से पहले बच्चों के साथ बैठें और उनके स्कूल, दोस्तों व पसंदनापसंद पर खुलकर बात करें ताकि वे अकेलापन महसूस न करें।
- अकेले न बैठने दें: बच्चे को फोन लेकर घर के किसी कोने में अकेले न बैठने दें। उन्हें दोस्तों के साथ बाहर खेलने या अन्य फिजिकल एक्टिविटीज में शामिल करें।
- इनडोर गेम्स और हॉबीज में लगाएं मन: बच्चों के साथ घर के अंदर लूडो, चेस, कैरम जैसे बोर्ड गेम्स खेलें। उन्हें पेंटिंग, आर्ट या संगीत सीखने के लिए प्रेरित करें।
- आउटडोर टाइम अनिवार्य करें: शाम को कम से कम एक घंटा बच्चों को पार्क में खेलने या साइकिल चलाने के लिए अनिवार्य रूप से भेजें।

