Yuva Haryana: हरियाणा में सरकारी धन के इस्तेमाल और खर्च में होने वाली गड़बड़ियों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने नया कानून लागू कर दिया है। अब नगर निगम से लेकर ग्राम पंचायतों, सरकारी विश्वविद्यालयों और अन्य सरकारी संस्थानों के खर्च का ऑडिट अधिक सख्ती से किया जाएगा। ऑडिट में सरकारी धन का गलत इस्तेमाल, अवैध भुगतान या लापरवाही के कारण वित्तीय नुकसान सामने आने पर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों से व्यक्तिगत रूप से वसूली की जा सकेगी।
हरियाणा सरकार ने 5 नवंबर 2026 को राजपत्र में हरियाणा स्थानीय लेखा-परीक्षा अधिनियम, 2026 प्रकाशित किया है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद प्रकाशित यह कानून राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से लागू हो गया है। इसका उद्देश्य सरकारी खजाने और स्थानीय निकायों के फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाना तथा वित्तीय जवाबदेही तय करना है।
किन संस्थानों पर लागू होगा नया कानून?
नए कानून के दायरे में हरियाणा के शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों को शामिल किया गया है। इनमें सभी नगर निगम, नगर परिषद, नगरपालिका समितियां, जिला परिषद, पंचायत समितियां और ग्राम पंचायतें शामिल हैं।
इसके अलावा राज्य के सभी विश्वविद्यालय, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार, हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी और महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज भी इसके दायरे में आएंगे। सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों तथा अन्य अधिसूचित स्थानीय निधियों का ऑडिट भी इस कानून के तहत किया जा सकेगा।
इससे स्थानीय स्तर पर सरकारी योजनाओं, विकास कार्यों, निर्माण परियोजनाओं और संस्थानों के खर्च की जांच के लिए एक मजबूत कानूनी व्यवस्था तैयार होगी।
ऑडिट में गड़बड़ी मिली तो अधिकारियों से होगी वसूली
इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी धन के गलत इस्तेमाल या वित्तीय नुकसान के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की जवाबदेही तय की जाएगी। कानून की धारा 12 के तहत स्थानीय लेखा विभाग का निदेशक ऐसे भुगतान को अस्वीकार कर सकता है, जो कानून के विरुद्ध किया गया हो।
यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा कदाचार के कारण सरकारी धन का नुकसान हुआ है, तो निदेशक उस व्यक्ति पर अधिभार (Surcharge) लगा सकता है। इसके तहत नुकसान की राशि संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति से वसूल की जा सकेगी।
वसूली की राशि निर्धारित होने के बाद संबंधित व्यक्ति को एक महीने के भीतर भुगतान करना होगा। यदि वह इस आदेश से असहमत है, तो आदेश मिलने के एक महीने के भीतर प्रशासनिक सचिव के पास अपील कर सकता है। निर्धारित समय में भुगतान नहीं करने पर रकम भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल की जा सकती है।
रिकॉर्ड नहीं देने पर 1,000 से 5,000 रुपये तक जुर्माना
नए कानून के तहत ऑडिट अधिकारियों को रिकॉर्ड और दस्तावेज मांगने के अधिकार दिए गए हैं। वे संबंधित संस्थानों से बिल, वाउचर, बैंक विवरण, भुगतान रिकॉर्ड, पत्राचार और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज भी मांग सकते हैं।
जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारी या कर्मचारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सवालों के जवाब देने और स्पष्टीकरण देने के लिए भी बुलाया जा सकता है।
यदि कोई व्यक्ति वैध मांग के बावजूद जानबूझकर रिकॉर्ड देने से इनकार करता है या इसमें लापरवाही करता है, तो उस पर 1,000 से 5,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, जुर्माना लगाने से पहले संबंधित व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस देना और जवाब के लिए 15 दिन का समय देना अनिवार्य होगा।
छह महीने में पूरा करना होगा ऑडिट
कानून के अनुसार, संबंधित स्थानीय निकायों और संस्थानों को वित्त वर्ष समाप्त होने के तीन महीने के भीतर अपने खाते ऑडिट के लिए तैयार करके प्रस्तुत करने होंगे। यदि कोई निकाय ऐसा करने में विफल रहता है, तो स्थानीय लेखा विभाग का निदेशक सरकार को उस संस्था का फंड रोकने की सिफारिश कर सकता है।
ऑडिट की प्रक्रिया अधिकतम छह महीने में पूरी करनी होगी। इसके बाद तैयार रिपोर्ट में अवैध भुगतान, सरकारी धन का दुरुपयोग, लापरवाही से हुआ नुकसान और वित्तीय अनियमितताओं का उल्लेख किया जाएगा।
ऑडिट रिपोर्ट मिलने के बाद संबंधित कार्यकारी प्राधिकारी को दो महीने के भीतर कमियों और अनियमितताओं को दूर करना होगा। रिपोर्ट और उस पर की गई कार्रवाई का विवरण संबंधित निकाय की बैठक में भी रखा जाएगा।
बैंक घोटालों के बाद बढ़ी जवाबदेही
हरियाणा में पंचायतों और शहरी निकायों के सरकारी फंड से जुड़े बैंक घोटालों के बाद वित्तीय निगरानी मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही थी। पंचकूला नगर निगम और कालका नगरपालिका परिषद से जुड़े IDFC First Bank-AU Small Finance Bank मामले में सरकारी धन के नुकसान की खबरें सामने आई थीं। इसके अलावा कोटक महिंद्रा बैंक से जुड़ा मामला भी चर्चा में रहा।
नए कानून से सरकार को स्थानीय निकायों और सरकारी संस्थानों के खर्च की नियमित जांच करने तथा गड़बड़ी सामने आने पर जिम्मेदारी तय करने में मदद मिलेगी। अब सरकारी धन के इस्तेमाल में लापरवाही या अनियमितता पाए जाने पर केवल विभागीय कार्रवाई ही नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्ति से आर्थिक नुकसान की वसूली भी संभव होगी।

