Yuva Haryana : भ्रष्टाचार की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। इसके तहत राज्य पुलिस केंद्रीय कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के अपराधों के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत राज्य पुलिस के अधिकारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर सकते हैं और आरोप पत्र भी दाखिल कर सकते है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य पुलिस द्वारा केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की पूर्व अनुमति की भी आवश्यकता नहीं है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराधों की जांच राज्य एजेंसी या केंद्रीय एजेंसी या किसी भी पुलिस एजेंसी द्वारा की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी बताया कि नियमानुसार जांच के लिए पुलिस अधिकारी एक विशेष रैंक का होना जरूरी है और इसका उल्लेख अधिनियम की धारा 17 में देखा जा सकता है।
क्या है धारा 17 ?
इस अधिनियम की धारा के तहत राज्य पुलिस या राज्य की किसी विशेष एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों को दर्ज या जांच करने से नहीं रोकती है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने ये भी कहा कि सुविधा और काम के दोहराव से बचने के लिए सीबीआई को केंद्र और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार व घूसखोरी के मामलों की जांच का काम सौंपा गया है।
इसी तरह राज्य की विशेष एजेंसी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को राज्य सरकार और उसके उपक्रमों के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार व घूसखोरी की जांच सौंपी है। पीसी एक्ट के तहत अपराध संज्ञेय है इसलिए राज्य पुलिस भी इनकी जांच कर सकती है।
शीर्ष अदालत ने फैसले में याचिकाकर्ता केंद्रीय कर्मचारी नवल किशोर मीणा की इस दलील को खारिज कर दिया कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के तहत स्थापित सीबीआई को ही केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों के केस दर्ज करने, जांच करने और आरोपपत्र दाखिल करने का अधिकार है।



