मनीष नरवाल और अशोक मलिक ने कांस्य को रजत में बदला, राम रतन, हिमांशु और प्रदीप ने जीते पदक
Yuva Haryana: एशियन पैरा गेम्स में हरियाणा के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश का मान बढ़ाया है। नागोया में आयोजित प्रतियोगिता में हरियाणा के खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और संघर्ष के दम पर कई पदक जीते। हरियाणा के खिलाड़ियों ने तीन रजत और दो कांस्य पदक अपने नाम किए। मनीष नरवाल और अशोक मलिक ने कांस्य पदक को रजत में बदलकर बड़ी उपलब्धि हासिल की, जबकि राम रतन, हिमांशु नांदल और प्रदीप कुमार ने भी अपने प्रदर्शन से सबका ध्यान खींचा।
इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां केवल पदकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे लंबे अभ्यास, चोटों से उबरने, तकनीकी चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों में हौसला बनाए रखने की कहानियां भी हैं।
मनीष नरवाल ने कमजोरी को ताकत में बदला

पानीपत के मनीष नरवाल ने पिस्टल शूटिंग में शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 233.7 अंकों के साथ रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। मनीष ने अपने प्रदर्शन से साबित किया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।
मनीष ने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने अभ्यास और अनुशासन के जरिए अपने खेल को लगातार बेहतर बनाया। पिस्टल शूटिंग जैसे खेल में एकाग्रता, धैर्य और हाथों का संतुलन बेहद महत्वपूर्ण होता है। मनीष ने इन सभी पहलुओं पर मेहनत करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की।
उनकी उपलब्धि हर उस खिलाड़ी के लिए प्रेरणा है, जो चुनौतियों के बावजूद अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहता है।
हिमांशु नांदल ने स्विमिंग में जीता कांस्य पदक

रोहतक के दृष्टिबाधित खिलाड़ी हिमांशु नांदल ने स्विमिंग में 5 मिनट 10.91 सेकंड का समय लेकर कांस्य पदक जीता। उनके लिए स्विमिंग केवल शारीरिक क्षमता की नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती की भी परीक्षा है।
हिमांशु ने बताया कि पूल की गहराई में उतरते समय उन्हें अपने पिता की कही बात याद आती है कि मैदान कोई भी हो, रफ्तार देश के तिरंगे से तेज होनी चाहिए। उन्होंने स्विमिंग पूल की चुनौती को ब्लैकआउट जैसा बताया। पानी में उतरने के बाद उन्हें आंखें होने या न होने का एहसास नहीं रहता और वह अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
अशोक मलिक ने 192 किलो वजन उठाकर जीता रजत

अशोक मलिक ने 192 किलो वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। पोलियो के कारण बचपन से उनके पैरों में कमजोरी रही है, लेकिन उन्होंने इस चुनौती को अपनी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।
वर्ष 2026 के ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भी उन्होंने 200 किलोग्राम का अपना सर्वश्रेष्ठ वजन उठाया था। हालांकि, तकनीकी अंकों के आधार पर वह चौथे स्थान पर रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और नागोया में बेहतर प्रदर्शन किया।
अशोक ने कहा कि उनके सामने लोहे की बार थी, जिसने ग्लासगो में उनका दिल तोड़ दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका रजत पदक इस बात का प्रमाण है कि लगातार प्रयास से मुश्किल परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है।
राम रतन ने दोस्तों के सहयोग से हासिल की सफलता
राम रतन की सफलता के पीछे संघर्ष और दोस्तों के सहयोग की कहानी है। उन्होंने बताया कि जब उनके पास पैसे नहीं थे, तब दोस्तों ने अपनी जेब से मदद करके उन्हें खेल की बारीकियां सीखने का अवसर दिया।
राम रतन ने कहा कि यह पदक केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी लोगों का है जिन्होंने एक गरीब खिलाड़ी के सपनों में भरोसा किया। उनकी उपलब्धि यह दिखाती है कि सही मार्गदर्शन, सहयोग और मेहनत से कठिन लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।
प्रदीप कुमार ने चक्का फेंक में जीता कांस्य

हिसार के प्रदीप कुमार ने चक्का फेंक स्पर्धा में 51.15 मीटर का प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीता। यह उनका पहला एशियन पैरा गेम्स था। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वह थोड़े नर्वस थे, लेकिन जब उनका थ्रो 51 मीटर से आगे गया, तो उन्हें अपनी मेहनत सफल होती दिखाई दी।
प्रदीप ने कहा कि पोडियम पर जब तीनों तिरंगे एक साथ ऊपर जा रहे थे, तो उन्हें लगा कि उनमें एक रंग उनकी मेहनत का भी है। उनका यह अनुभव खेल के प्रति समर्पण और देश के लिए पदक जीतने के गौरव को दर्शाता है।
हरियाणा के खिलाड़ियों ने बढ़ाया देश का मान
नागोया में हरियाणा के खिलाड़ियों का प्रदर्शन दिखाता है कि दिव्यांग खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा से बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। मनीष नरवाल, अशोक मलिक, हिमांशु नांदल, राम रतन और प्रदीप कुमार की सफलता के पीछे निरंतर अभ्यास, आत्मविश्वास और संघर्ष की भूमिका रही है।
इन खिलाड़ियों ने पदक जीतकर न केवल हरियाणा, बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया है। उनकी कहानियां युवा खिलाड़ियों और दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणा हैं कि सीमित संसाधनों या शारीरिक चुनौतियों के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति से सफलता की नई ऊंचाइयां छुई जा सकती हैं।

