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हिसार: केमिकल से 48 घंटे में पकाए जा रहे केले, कैंसर का खतरा

khushi Mukhija
Last updated: October 18, 2026 3:25 pm
khushi Mukhija
Published: October 18, 2026
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Yuva Haryana: त्योहारी सीजन और शादियों के दौरान बाजारों में फलों की मांग बढ़ते ही मुनाफाखोरी का काला खेल शुरू हो गया है। रोक के बावजूद हिसार में गोदामों से लेकर मंडियों और छोटी दुकानों तक में फलों (विशेषकर केला और पपीता) को जल्दी पकाने के लिए जानलेवा रसायनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।

जहाँ प्राकृतिक रूप से केला पकने में 5 से 7 दिन का समय लेता है, वहीं व्यापारी मुनाफा कमाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide) का प्रयोग कर इसे महज 48 घंटे (2 दिन) में पकाकर बाजार में बेच रहे हैं।

मांग में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: रोजाना की खपत 120 टन तक पहुंची

नवरात्र और आगामी त्योहारों के कारण शहर में फलों की खपत में भारी उछाल दर्ज किया गया है। सामान्य दिनों में जहां हिसार में केले की दैनिक खपत 80 टन होती है, वहीं त्योहारों के सीजन में यह बढ़कर 120 टन पहुंच गई है। इसके अलावा, शहर में पपीते की दैनिक खपत 30 टन दर्ज की गई है। हिसार में केले की मुख्य आपूर्ति मुख्य रूप से महाराष्ट्र के भुसावल और उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से की जा रही है।

बड़े स्टोर्स में जहां निर्धारित मात्रा से अधिक एथिलीन गैस का प्रयोग हो रहा है, वहीं मंडियों और छोटी दुकानों में घातक कैल्शियम कार्बाइड से फल पकाए जा रहे हैं, जबकि इस पर रोक है।

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स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा: लिवर और किडनी पर असर

खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, कैल्शियम कार्बाइड से फलों को पकाना अत्यंत हानिकारक है। फूड सेफ्टी ऑफिसर डॉ. काजल के मुताबिक, एक नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस से फल पकाना सुरक्षित है, लेकिन कैल्शियम कार्बाइड हानिकारक व प्रतिबंधित है। यह एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जिससे पेट दर्द, उल्टी, चक्कर आना और लंबे समय में लिवर व किडनी को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

ऐसे पहचानें: नेचुरल पका फल और केमिकल वाले फल में अंतर

हांसी मंडी के फ्रूट विक्रेता एजेंट विनोद ने प्राकृतिक और केमिकल से पके फलों की पहचान के बारे में बताया है:

प्राकृतिक केला: हल्का पीला और भूरे धब्बता वाला होता है, जबकि केमिकल से पका केला बहुत ज्यादा चमकीला और एकसमान पीला दिखता है।

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केले का डंठल: प्राकृतिक केले का डंठल पूरे फल के साथ ही पकता है, जबकि केमिकल वाला केला पीला होने पर भी डंठल हरा रह जाता है।

पपीते की पहचान: प्रकृति से पका हुआ पपीता हल्का पीला और नारंगी दिखेगा। केमिकल से पका पपीता पूरा चमकीला पीला और इस पर हल्के हरे रंग के धब्बे भी हो सकते हैं।

स्वाद और सुगंध: प्राकृतिक केला अंदर-बाहर से मुलायम, क्रीमी और मीठा होता है और उससे अच्छी सुगंध आती है। इसके विपरीत, केमिकल से पका केला बाहर से नरम लगने पर भी अंदर से सख्त व फीका रह सकता है और उसमें वैसी खुशबू नहीं होती। इसी तरह पपीते के रंग और स्वाद से भी उसकी पहचान की जा सकती है।

संपादकीय अपील

खाद्य सुरक्षा विभाग को ऐसे मुनाफाखोरों और जानलेवा केमिकल का प्रयोग करने वाले गोदामों पर तुरंत छापेमारी कर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। आम जनता को भी बाजार में खरीदारी करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि वे सेहत से जुड़े इस गंभीर खतरे से बच सकें।

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