Yuva Haryana: पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान संस्थान (PGIMS), रोहतक के डॉक्टरों और एक पिता के अटूट विश्वास ने चिकित्सा जगत में एक नया इतिहास रच दिया है। सोनीपत के रहने वाले एक टैक्सी चालक सोमबीर दहिया का 8 साल का बेटा करीब 23 महीने (लगभग 700 दिन) तक पीडियाट्रिक आईसीयू (PICU) में लाइफ सपोर्ट (वेंटिलेटर) पर रहने के बाद आखिरकार पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौट आया है।
5 अक्टूबर 2024 को बिगड़ी थी हालत
बच्चे को 5 अक्टूबर 2024 को गंभीर दिमागी बुखार (एन्सेफलाइटिस) के कारण बेहद नाजुक हालत में रोहतक PGIMS में भर्ती कराया गया था। उस समय उसका ग्लासगो कोमा स्केल (GCS) स्कोर घटकर 3 पर आ गया था, जो कि डीप कोमा या ‘ब्रेन डेथ’ जैसी स्थिति मानी जाती है।
40 साल के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि
पीडियाट्रिक्स विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर और ‘पिक्कू’ (PICU) के इंचार्ज डॉ. कुंदन मित्तल ने इस मामले को अपने 40 साल के लंबे चिकित्सा करियर की सबसे बड़ी और अनोखी उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट पर रहने के बाद किसी बच्चे का पूरी तरह ठीक होकर अपने माता-पिता को पहचानना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
24 घंटे निगरानी और निरंतर इलाज से मिली सफलता
लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहने की वजह से बच्चे के दिमाग को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ गंभीर साइड-इफेक्ट्स, संक्रमण (Infections) और बेडसोर (Bedsore) से बचाना डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी।
- चिकित्सकों की टीम ने 24 घंटे लगातार निगरानी रखते हुए:
- संक्रमण और त्वचा की समस्याओं (बेडसोर) से बचाया।
- अंगों और मांसपेशियों को सक्रिय रखने के लिए कस्टमाइज्ड न्यूट्रिशन दिया।
- निरंतर फिजियोथेरेपी और संतुलित दवाइयाँ प्रदान कीं।
शोध के आंकड़े और अन्य मामले
ग्लोबल पीडियाट्रिक रिसर्च के अनुसार, 14 दिनों से अधिक वेंटिलेटर पर रहने वाले 67% से ज्यादा बच्चों में निमोनिया या मल्टी-ऑर्गन फेलियर जैसी जानलेवा जटिलताओं से बचने की उम्मीद बेहद कम होती है।
इससे पहले ऐसे दुर्लभ मामलों में:
पुणे (महाराष्ट्र): कोरोना के बाद गंभीर निमोनिया से पीड़ित 4 साल का मासूम 45 दिन तक वेंटिलेटर पर रहा था।
कोलकाता (पश्चिम बंगाल): 11 साल की बच्ची 75 दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद रिकवर हुई थी।
ऐसे में 700 दिनों की लंबी लड़ाई जीतकर बच्चे का मुस्कुराते हुए घर लौटना देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक मिसाल बन गया है।

