हरियाणा के सिरसा में ‘मेरी फसल-मेरा ब्यौरा’ पोर्टल पर फर्जी पंजीकरण का मामला सामने आया है। सीएम फ्लाइंग की जांच में कपास की फसल वाले खेतों में धान का पंजीकरण कर सरकारी खरीद में बेचने के आरोपों की पड़ताल की गई है।
Yuva Haryana: हरियाणा के सिरसा जिले में फसल खरीद और सरकारी रिकॉर्ड से जुड़ा कथित फर्जीवाड़ा सामने आने से कृषि व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें जमीन पर कपास की फसल होने के बावजूद रिकॉर्ड में धान की फसल दर्ज दिखाई गई। आरोप है कि ‘मेरी फसल-मेरा ब्यौरा’ पोर्टल पर फर्जी पंजीकरण कर बाहरी राज्यों से लाए गए धान को सरकारी खरीद व्यवस्था के माध्यम से बेचा गया। मामले में 45 से अधिक राइस मिल मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी की बात सामने आई है।
सीएम फ्लाइंग की टीम ने वर्ष 2025 के धान खरीद-बिक्री रिकॉर्ड की जांच के दौरान इस कथित गड़बड़ी की पड़ताल की। जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि जिन खेतों में कपास की फसल थी, वहां धान की फसल का पंजीकरण कैसे हुआ और सरकारी खरीद के लिए धान कहां से लाया गया।
कपास की जमीन पर धान का पंजीकरण, जांच में खुली गड़बड़ी
जांच के दौरान सिरसा जिले के मुसाहिबवाला, डिंग, बामा और सहारणी सहित अन्य गांवों के मामलों की पड़ताल की गई। आरोप है कि कुछ किसानों की जमीन पर कपास की फसल दर्ज होने के बावजूद ‘मेरी फसल-मेरा ब्यौरा’ पोर्टल पर धान का पंजीकरण दिखाया गया। इसके आधार पर धान की सरकारी खरीद किए जाने की बात सामने आई।
मामले में यह भी जांच की जा रही है कि धान की वास्तविक आवक कहां से हुई और उसे किसने उपलब्ध कराया। जांच अधिकारियों के सामने यह सवाल भी है कि जब संबंधित जमीन पर धान की फसल मौजूद नहीं थी, तो सरकारी खरीद रिकॉर्ड में उसकी बिक्री कैसे दर्ज हुई।
45 से ज्यादा राइस मिल मालिक जांच के दायरे में
मामले में 45 से अधिक राइस मिल मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी की जा रही है। जांच एजेंसियां खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड, किसानों के पंजीकरण और जमीन के वास्तविक उपयोग से जुड़े तथ्यों का मिलान कर रही हैं।
हालांकि, एफआईआर दर्ज होने, आरोप तय होने और अदालत में दोष साबित होने के बीच अंतर है। इसलिए जांच पूरी होने और संबंधित अधिकारियों की आधिकारिक पुष्टि के बाद ही आरोपियों की भूमिका और मामले की पूरी स्थिति स्पष्ट होगी।
किसानों को पंजीकरण की जानकारी नहीं होने का दावा
जांच के दौरान कुछ किसानों ने कथित तौर पर बताया कि उन्होंने अपनी जमीन पर धान की फसल का पंजीकरण नहीं कराया था। कुछ मामलों में किसानों को यह भी जानकारी नहीं थी कि उनके नाम पर फसल का पंजीकरण दिखाया जा रहा है।
कुछ पंजीकरणों में दर्ज मोबाइल नंबर और बैंक खातों की जानकारी किसानों के वास्तविक विवरण से मेल नहीं खाती थी। ऐसे तथ्यों की जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि पंजीकरण किसने कराया और खरीद से मिलने वाले भुगतान का लाभ किसे मिला।
लगभग एक साल तक रिकॉर्ड की जांच
जांच टीम ने करीब एक साल तक मामले से जुड़े रिकॉर्ड और दस्तावेजों की पड़ताल की। इसमें जमीन के मालिकाना हक, फसल पंजीकरण, खरीद के रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयानों की जांच शामिल रही। जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट भेजने और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई की तैयारी की बात कही गई है।
पहले भी सामने आ चुके हैं फर्जी पंजीकरण के मामले
हरियाणा में ‘मेरी फसल-मेरा ब्यौरा’ पोर्टल पर फर्जी पंजीकरण के आरोप पहले भी सामने आ चुके हैं। अक्टूबर 2025 में नवभारत टाइम्स ने फतेहाबाद में एक ऐसे मामले की रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें कथित तौर पर फर्जी भूमि पंजीकरण के जरिए धान की सरकारी खरीद दिखाकर भुगतान प्राप्त किया गया।
इन मामलों से स्पष्ट है कि फसल पंजीकरण, वास्तविक उपज और सरकारी खरीद के रिकॉर्ड का सत्यापन बेहद जरूरी है। सिरसा मामले में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में किन लोगों की भूमिका सामने आती है और किसानों के नाम पर कथित तौर पर किए गए पंजीकरण की जिम्मेदारी किसकी तय होती है।

