Yuva Haryana: भारत में हर साल लाखों नए टीबी के मरीज सामने आते है और बड़ी संख्या में लोग पोषण की कमी से जूझते है। ऐसे में दो भारतीय डॉक्टरों की एक शोध को आधार मानते हुए हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपनी नई गाइडलाइन जारी की है।
दरअसल, शोध में यह साबित किया गया कि टीबी मरीजों के इलाज के लिए पौष्टिक आहार उतने ही जरूरी है जितनी कि दवा। ऐसे में अब डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि टीबी के मरीजों के परिवारों को भी भोजन सहायता देनी चाहिए, खासकर उन जगहों पर जहां लोगों को खाने की कमी होती है।
ऐसा पहली बार होगी कि डब्ल्यूएचओ की नई गाइडलाइन में पोषण को टीबी के इलाज के लिए जरूरी बताया गया है। पहले टीबी के इलाज का फोकस सिर्फ दवाओं और मेडिकल निगरानी पर होता था। लेकिन अब डब्ल्यूएचओ का स्पष्ट मानना है कि अगर मरीज और उसका परिवार कुपोषित है तो दवाओं का असर भी अधूरा रहता है।
आपको बता दें कि भारत के उन इलाकों में यह शोध किया गया, जहां टीबी के मामले ज्यादा है और लोग कुपोषण से जूझ रहे हैं। इस शोध में सामने आया कि जिन मरीजों को पौष्टिक आहार दिया गया, उनमें इलाज की सफलता दर काफी बढ़ी।
शोध करने वाले डॉक्टरों का मानना है कि कुपोषण टीबी का सबसे बड़ा जोखिम कारक है, जिन लोगों का वजन कम है या जो पर्याप्त पोषण नहीं पा रहे, उन्हें टीबी होने की संभावना कई गुना ज्यादा रहती है। इतना ही नहीं, ऐसे मरीजों में ठीक होने की प्रक्रिया भी धीमी होती है।
इस रिसर्च ने यह स्पष्ट किया कि पोषण को नजरअंदाज करके टीबी से लड़ना संभव नहीं है। डब्ल्यूएचओ ने इस शोध को आधार बनाकर अपनी नई नीति में पोषण को अनिवार्य तत्व के रूप में जोड़ा है।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि टीबी को खत्म करने के लिए हमें कुपोषण और खाद्य असुरक्षा का समाधान करना होगा। पोषण को टीबी उपचार का हिस्सा बनाना, बीमारी और गरीबी के चक्र को तोड़ने की दिशा में अहम कदम है।
ऐसे में अब इस नई गाइडलाइन से उम्मीद है कि सरकारें और स्वास्थ्य संस्थाएं टीबी मरीजों को सिर्फ दवाएं नहीं, बल्कि भोजन और पोषण सहायता भी देंगी।



