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हरियाणा के पानीपत जिले के इतिहास और आकर्षित स्थल की कहानी है कुछ खास, जानिए इन स्थलो का रहस्य
 

आज हम आपको पानीपत शहर के मुख्य पर्यटन स्थलों की जानकारी देंगे बता दें कि पानीपत को बड़ा ही सुंदर शहर माना जाता है और पानीपत शहर का ही पुरानी हस्तियों को भी अपने साथ जोड़ता है दिल्ली से पानीपत का सफर तकरीबन 90 किलोमीटर की दूरी पर है और यहां पर हमें प्राचीन ऐतिहासिक समृद्धि इतिहास और सम्राटों के बारे में पता लगता है यहां केवल पर्यटन ही नहीं बल्कि धार्मिक स्थल भी है। पानीपत जैसे खूबसूरत शहर को  महाभारत के दौरान पांडवों द्वारा पांच शहरों में से एक माना जाता। और पानीपत की खूबसूरती को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। इतना ही नहीं यहां पर विदेशों से भी पर्यटक लोग आते हैं। 


सबसे पहले हम बात करेंगे पानीपत के देवी मंदिर की बता दें कि यह मंदिर इतना आकर्षित है और इतना सुंदर यह मंदिर तकरीबन 250 वर्ष पुराना है और यह पूरा मंदिर एक तालाब के किनारे पर बना हुआ है यह उस समय की बात है जब मराठा योद्धा सदाशिवराव भाऊ सेना को लेकर यहां युद्ध करने को आए थे और उन्होंने यह युद्ध अफगान से आए आक्रमणकारी अहमदाबाद अब्दाली के खिलाफ लड़ा और इस युद्ध के बाद की जाए तो यह युद्ध 2 महीने चला सबसे पहले सदाशिव राव की मूर्ति एक तालाब के किनारे मिली तो उस समय उस मूर्ति को वहां से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया गया। लेकिन जैसे ही सुबह हुई एक चौंकाने वाली बात सामने आई कि वह मूर्ति उसी तालाब के किनारे अपने आप पहुंच गए और सभी को उसी स्थान पर मिली उसके बाद से ही इस स्थल पर मंदिर बनाने का निर्णय लिया गया। 

 

इसके बाद दूसरा पर्यटक चलाता है काला अंब यहां पर पानीपत की तीसरी लड़ाई की गई थी और यह लड़ाई मुगलों की तरफ से अहमदशाह अब्दाली  और मराठों की तरफ से सदाशिव भाऊ के बीच की गई थी और इस युद्ध में जितना भी खून बहा वह आस-पास के पेड़ और जमीन पर गया तो वह सब काला पड़ गया तभी से इसका नाम काला अंब रख दिया गया। इतना ही नहीं यह पानी पत्तल काला अंब पर एक काला वृक्ष भी हुआ करता था। 

 

तीसरा पर्यटन स्थल पानीपत में इब्राहिम लोधी का मकबरा को कहा जाता है। यह प्रथम युद्ध का प्रतीक भी माना जाता है और इस मकबरे के अंदर अब्राहिम लोधी का कब्र भी बनाया गया है। इतना ही नहीं इसका लाखोरी ईटों से निर्मित कब्र एक ऊंचे आयात कार के रूप में स्थापना भी करी हुई है। इसके बाद से ही सर्वेक्षण विभाग की ओर से इस मकबरे को संरक्षित घोषित कर दिया गया। 


पानीपत में एक ऐसा स्थान है जहां पर ताले मारकर मन्नत मांगी जाती है और इस दरगाह का नाम है बू अली शाह कलंदर की दरगाह। खिलजी के बेटे ने इस दरगाह को बनाया था और उनके पिता का नाम से  शेख शर्राफुद्दीन था।  कहते हैं की दरगाह पर सिर्फ मुसलमानों का जाना होता है लेकिन दरगाह पर हजारों की संख्या में हिंदू भी पहुंचते हैं पानीपत की यह सबसे पहले दरगाह है और इसकी दूसरी दरगाह पाकिस्तान में है और तीसरी दरगाह इराक में बनी हुई है। इराक की दरगाह की बात की जाए तो वह दरगाह महिला सूफी की है यही कारण है कि आधी दरगाह का दर्ज उन्हें मिला हुआ है अजमेर शरीफ में चादर चढ़ाने वाले सभी लोग पानीपत जरूर आते हैं। इतना ही नहीं इस दरगाह में हिंदुस्तानी और मुसलमानों में भी कोई फर्क नहीं किया जाता।  

अब हम बात कर रहे हैं पानीपत में काबुली बाग मस्जिद की जो सुल्तान बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोदी पर विजय पाने की खुशी में बनाई थी। इस मस्जिद के लिए लाल बालू के रंग और ईटों से बने मुख्य द्वार के सामने बड़ा महल मेहराब भी बना हुआ है और यह है ढाई सौ 3 एकड़ में बनी मस्जिद के उत्तर दिशा में भी प्रवेश द्वार बनाए गए हैं।