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कैंसर को मात देने के लिए अपनाया फिटनेस का रास्ता, साइकिल से हॉस्पिटल जाती है यह डॉक्टर
 
अर्बन एस्टेट में रहने वाली रीतू जसूजा अपनी मां से प्रेरित होकर फिटनेस के प्रति जागरूक हुई और दौड़ लगाना शुरू किया। वहीं इनसे प्रेरित होकर अब इनका पूरा परिवार मैराथन दौड़ लगाता है। यही नहीं इन्होंने अपनी फिटनेस के दम पर थायरायड कैंसर को भी मात दी है। रीतू जसूजा बताती है कि उनकी माता राज चाैपड़ा यूपी स्टेट एथलेक्टिस चैंपियनशिप में गोल्ड मेडलिस्ट थी। कई प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीते थे, उन्ही से प्रेरित होकर दौड़ लगाना शुरू किया था। लेकिन वर्ष 2017 में सिटी स्कैन में अचानक कैंसर का पता लगा तो लगा कि जिंदगी थम सी गई है।कर्मियों ने हिम्मत दी तो कैंसर का उपचार शुरू करवाया। आपरेशन करवाया तो शरीर में कैल्शियम कम हो गया। जिससे अचानक इमरजेंसी में दाखिल होना पड़ा। तब छह महीने तक तनाव में रही। उस दौरान परिवार का साथ मिला तो तनाव और कैंसर दोनों से उभर गई। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब परिवार के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में भी दौड़ लगा रही हूं। हालांकि जल्दी थक जाती हूं लेकिन अब कैंसर से पूरी तरक ठीक हो चुकी हूं। जिंदल अस्पताल में बेहोशी की यह डाक्टर साइकिल पर अस्पताल पहुंचती हैं।
रीतू रीतू जसूजा ने बताया कि उसका 13 साल का बेटा रोहन और 15 साल की बेटी काव्या भी 10 किलोमीटर की मैराथन कर चुके है। 27 मार्च और 27 जून को शिमला में टफमैन मैराथन दौड़ में पूरे परिवार ने भाग लिया था। रीतू ने बताया कि चार किलोमीटर की दौड़ 15 साल तक के बच्चों के लिए थी। लेकिन रोहन और काव्या ने वहां 10 किलोमीटर दौड़ अपने रिस्क पर की। रोहन ने एक घंटा 16 मिनट और काव्या ने एक घंटा 39 मिनट में दौड़ पूरी की। रीतू जसूजा ने बताया कि उन्होंने खुद 21 किलोमीटर की दौड़ पूरी की। वहीं उनके पति देवेंद्र जसूजा ने 50 किलोमीटर मैराथन दौड़ सात घंटे 23 मिनट में की। इसके लिए उन्हें मेडल और सर्टिफिकेट भी मिला। रोहन जसूजा जिंदल माडर्न स्कूल में नौंवी कक्षा का छात्र है।अर्बन एस्टेट निवासी जिंदल अस्पताल में एनेस्थीसिया विशेषज्ञ यानि बेहोशी की डाक्टर रीतू जसूजा ने बताया कि वह और उनके पति दोनों मेडिकल फील्ड में है। उनके पति देवेंद्र जसूजा भी हिसार में निजी स्किन सेंटर चलाते है। उनकी बड़ी बेटी आरूषि 21 साल की है। पूरा परिवार सुबह और शाम दौड़ लगाता है। वहीं वह खुद जिंदल में हैड आफ डिपार्टमेंट है और साइकिल पर अस्पताल पहुंचती है। वहीं घर के सारे काम भी खुद करती हूं। बागवानी भी खुद करती है। रीतू ने बताया कि उनके नाना सोमनाथ स्वतंत्रता सेनानी थी। पाकिस्तान भारत के बंटवारे के बाद वे आगरा में रहने लगे थे। नाना के छह बच्चे थे, कहते थे सभी को पढ़ा लिखा कर कुछ बनाउंगा जरुर, उनकी खेलों में अधिक रुचि थी और अन्य बच्चों समेत उसकी माता राज चौपड़ा को भी खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। माता राज चौपड़ा बाद में एचएयू के कैंपस स्कूल में बायोलोजिट टीचर लगी थी।