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भ्रूण हत्या पर बनी मराठी फिल्म ' वाय ' की चंडीगढ़ में मिली स्पेशल स्क्रीनिंग, मन को झकझोरती है यह फिल्म
 

देश के पुरुषवादी समाज में कन्या भ्रूण हत्या की मानसिकता और इस काम में लगे चिकित्सकों को हतोत्साहित करने के लिए यूं तो बहुत फिल्में बनी हैं, लेकिन बड़े परदे की मराठी फिल्म वाय (Y) ने इस सामाजिक बुराई को उजागर किया है और इस काम में लगे लोगों को बेनकाब भी किया गया है। भ्रूण हत्या के लिए बदनाम रहे हरियाणा व पंजाब के लिए तो यह फिल्म खास संदेश देती है।  

यह फिल्म पुरुषवादी मानसिकता पर औरत के संघर्ष की जीत को करती है रेखांकित

लेखक और निर्देशक डा. अजीत सूर्यकांत वाडीकर ने जानदार फिल्मांकन, शानदार संगीत और श्रेष्ठ चरित्र अभिनेताओं के सहयोग से पुरुष मानसिकता पर औरत के संघर्ष की जीत को बहुत ही बढ़िया ढंग से दर्शकों के सामने रखने में सफलता हासिल की है।

फिल्म के जरिये कन्या भ्रूण हत्या की मानसिकता और इस काम में लगे चिकित्सकों पर कड़ा प्रहार

चंडीगढ़ के एलांते माल में शनिवार को मराठी फिल्म वाय की पूरी स्टार कास्ट थी, जो मराठी भाषा को समझने वाले लोगों के लिए इस फिल्म को देखने की पेशकश के साथ पहुंची। मराठी फिल्म जोगवा, डबल सीट और स्माइल प्लीज में अपने अभिनय के जरिये स्थापित हो चुकी फिल्म अभिनेत्री मुक्ता बर्वे ने वाय में अपने किरदार के मुताबिक शानदार अभिनय किया।

फिल्म के अंत में मुक्ता बार्वे जिस तरह महिलाओं को अपने ऊपर होने वाले शारीरिक व मानसिक अत्याचार के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देती दिखाई देती हैं, वह उन्हें दर्शकों के बहुत करीब लाकर खड़ी करती है। वास्तविकता पर आधारित इस फिल्म का फिल्मांकन करते हुए निर्देशक डा. अजीत वाडीकर ने किरदारों का चयन किया है। 

यह एक संयोग है कि पहली बार के निर्देशक डा. अजीत सूर्यकांत वाडीकर की फिल्म वाय यशराज फिल्म्स की जयेशभाई जोरदार के कुछ सप्ताह बाद ही रिलीज हुई है। दोनों फिल्मों में एक ही सामाजिक बुराई पर ध्यान केंद्रित करने के बावजूद मराठी फिल्म वाय की शैली लोगों के दिलों के काफी करीब नजर आई।

इस फिल्म के किरदारों का सफर 2007 में महाराष्ट्र के विश्रामपुर शहर से शुरू होता है, जहां रेडियोलाजिस्ट पुरुषोत्तम गायकवाड़ (नंदू माधव) एक अस्पताल चलाता है। एक नैतिक चिकित्सक के लिबास के पीछे गायकवाड़ अवैध लिंग परीक्षण का काम करता है और गर्भपात करने में माहिर है। उसके अस्पताल में पैर रखने की जगह नहीं होती, क्योंकि वहां कन्या भ्रूण हत्या को प्रोत्साहित किया जाता है।

अभिनय के लिहाज से नंदू माधव का किरदार हालांकि नकारात्मक है, लेकिन एक्टिंग में उन्होंने मुक्ता बर्वे का बराबर साथ दिया है। डा. आरती देशमुख (मुक्ता बर्वे) एक अधिकारी है, जिसे यह जांचने का काम सौंपा गया है कि क्या शहर के डाक्टर गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम का सही ढंग से पालन कर रहे हैं।

इस एक्ट के जरिये केंद्र सरकार देश में कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का काम करती है, जिस पर हालांकि काफी हद तक काबू कर लिया गया है, मगर फिर भी अभी पुरुषवादी समाज में बेटे की चाह कम नहीं हुई है। डा. आरती देशमुख को सूचनाएं मिलती हैं कि डा. पुरुषोत्तम गायकवाड के अस्पताल में कुछ भी सही नहीं चल रहा है, लेकिन उसे सबूत जुटाने में सफलता नहीं मिल पाती। इसके बावजूद वह हतोत्साहित नहीं होती और इस सामाजिक बुराई के विरुद्ध अपनी जंग को आखिर तक जारी रखती है, जिसमें उसे सफलता जरूर मिलती है।

डा. अजीत वाडीकर ने अपनी इस फिल्म के जरिये गांव-देहात में कन्या भ्रूण हत्या की बुराई को उजागर करने के साथ ही उसे खत्म करने का संदेश भी इस फिल्म में दिया हैं। वाडीकर खुद एक चिकित्सक होने के कारण फिल्म के यथार्थ और सामाजिक बुराई को बहुत ही बढ़िया ढंग से परदे पर लोगों के सामने लाने में कामयाब होते दिखाई देते हैं। फिल्म की शुरुआत एक के बाद एक कई घटनाओं को पेश करते हुए होती है। लेकिन बाद में फ्लैशबैक मोड में चली जाती है और पूरी कहानी आपस में जुड़ती हुई दिखाई देती है।

राकेश के भिलारे की सिनेमेटोग्राफी एक सुलझे हुए कैमरामैन की तरह है, जबकि पराग छाबड़ा का मूल संगीत कम इस्तेमाल होने के बावजूद असर छोड़ता है। फिल्म में पूरे समय डा. आरती देशमुख परदे पर छाई रहती हैं और ऐसी महिलाओं को प्रेरणा देने में सफल होती हैं, जो पुरुषवादी समाज की सोच का शिकार होते हुए अपने दिल का कहा नहीं मान पाती। गलत काम करने वालों को बेनकाब करने का उनका दृढ़ संकल्प और संघर्ष वास्तविक प्रतीत होता है।

दादा साहब फाल्के के निबंध के लिए सबसे ज्यादा जाने जाने वाले नंदू माधव को एक नकारात्मक चरित्र निभाते हुए देखा जाता है। खलनायक मुन्ना, सहायक अभिनेता ओंकार गोवर्धन, संदीप पाठक, रोहित कोकाटे और बाल अभिनेत्री काव्या पाठक ने भी फिल्म में अच्छा काम किया है। कुछ चीजें हैं जो वाय के खिलाफ काम करती हैं।  डा. अजीत वाडीकर कहते हैं कि मुझे इस बात की खुशी है कि हम बेहतरीन कलाकारों के माध्यम से एक सामाजिक बुराई को सामने लाने के साथ ही उसका समाधान पेश करने में कामयाब हुए हैं।