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जैसे कोयले की खान में हीरा तराशा जाता है वैसे ही गुरु अपने शिष्य की पहचान कर उसको बनाया 'हॉकी की रानी'
 
शिष्य के लिए गुरु एक अहम भूमिका निभाता है गुरु ही एक ऐसी चीज है। जो अपने बच्चों को आगे बढ़ता देख कभी भी दुखी नहीं होता। एक शक्श ऐसा हुआ जिसका नाम लेते ही हॉकी के जाने-माने चेहरे सामने आ जाते हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं शाहाबाद की जिसका नाम लेते ही हॉकी के स्टार खिलाड़ी रानी रामपाल, नवनीत कौर और नवजोत कौर के चेहरे सामने आ जाते हैं। यह एक ऐसे हीरो हैं जो की कोयले की खान में तराश किए हुए है। इन हीरो को गुरु ने तराशा है जिसको शायद कोई जानता तक नहीं। बेटियों के हाथों में स्टिक पकड़ने की स्‍टाइल से ही उनकी प्रतिभा को भांपने वाले कोच बलदेव ने उन्‍हें उड़ने को आसमां दिया।
यह तीनों बेटियां ऐसी हैं जिन्होंने साबित कर दिखाया कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं होती। इन्होंने देश का नाम खूब रोशन कर दिखाया है यह वह बेटियां है जिन्होंने ओलंपिक से लेकर हॉकी वर्ल्ड कप तक अपना नाम रोशन कर जीत हासिल करी। रानी रामपाल सेहत के चलते इस बार वर्ल्ड कप में नहीं खेल सकी। बाकी नवनीत कौर और नवजोत कौर आज हाकी वर्ल्ड कप में देश का नाम ऊंचा कर रही है। 
हाकी कोच बलदेव सिंह। आज गुरु पूर्णिमा है। हर कोई अपने गुरु की पूजा करता है। इन स्टार के गुरु बलदेव सिंह है। जिन्होंने एक छोटी सी उम्र में उनके हुनर को पहचाना और उसको तराशा भी। बलदेव सिंह आजकल पंजाब केे लुधियाना में युवा पीढ़ी को प्रशिक्षण दे रहे हैं।
नवनीत कौर भारतीय हाकी टीम में फारवर्ड खिलाड़ी हैं। उन्होंने टोक्यो ओलिंपिक में कई गोल किए थे। वह अब वर्ल्ड कप में लगातार मैच खेल रही हैं। नवनीत कौर भारतीय रेलवे में खेल प्रशिक्षक के पद पर हैं। पिता बूटा सिंह ने बताया कि नवनीत ने चौथी कक्षा में हाकी खेलनी शुरू की थी। उन्होंने बताया कि स्टेडियम उनके घर के नजदीक था। उसी समय बेटी को दूसरे बच्चियों को देखकर खेेलने की इच्छा जताई। उन्होंने 2005 में ही बेटी को मैदान पर भेजना शुरू कर दिया। वह सुबह साढ़े चार बजे मैदान पर जाती थी और उधर से सीधे स्कूल चली जाती थी। दोपहर बाद छुट्टी के बाद फिर मैदान में चली जाती थी। कोच बलदेव सिंह ने उनको हाकी की बारीकियों को सिखाया। वह आज कोच बलदेव सिंह के मार्गदर्शन में मुकाम पर है।
नवजोत कौर नेे पांचवीं कक्षा में कोच बलदेव की देखरेख में हाकी को संभाला। वह भारतीय हाकी टीम में फारवर्ड और मैन फील्डर है। अब वर्ल्ड कप में भाग ले रही हैं। उनको अपने खेल पर पिछले दिनों ही भीम अवार्ड मिला है। पिता सतनाम सिंह ने बताया कि हाकी का मैदान नजदीक ही था। यहां से बच्चियां निकलकर जाती थी तो नवजोत का भी खेलने का मन करता था। उसकी मां मनजीत कौर की नवजोत को हाकी में आगे ले जाने की इच्छा थी। कोच बलदेव सिंह ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और मैदान पर तराशा। वह बदलेव सिंह को हाकी में अपना गुरु मानती हैं।
युवा पीढ़ी के लिए रानी रामपाल भारतीय महिला हॉकी टीम से कप्तान है जोकि आजकल की लड़कियों के लिए एक मिसाल बनती जा रही है। बेटी रानी ने बचपन में हॉकी खेलने की बात कही थी यह बात रानी के पिता रामपाल ने बताया। अपनी इच्छा उन्होंने कोच बलदेव को भी जताई। जब उन्होंने अपनी इच्छा कोच को बताई तो कोच ने उनकी इच्छा को पहचान कर उनको भूखी के मैदान में उतारा और उन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन भी दिखाया। उसको घोड़ा बग्गी में स्टेडियम तक लाता और ले जाता था। इसके बाद रानी ने साइकिल ली। वह साइकिल से स्टेडियम आती थी। उसके यहां तक पहुंचने में कोच बलदेव सिंह का विशेष योगदान रहा है।